चलते-चलते: विदा 2017

अस्त होते सूर्य की मद्धिम लालिमा के साथ ही यह वर्ष भी समाप्त हो जाएगी। उल्लास सिर्फ आने वाला कल है जिसे हम सब नव वर्ष दिवस कह कर उसे खुशामदीद कहते हैं। यही तो प्रकृति का काल चक्र है। समय का पहिया अनवरत घूम रहा है। इसी के इर्द-गिर्द दुनिया की तमाम संभावनाएं सीमित होकर रह जाती हैं। इसी से ही आदमी की विरासत इतिहास का पन्ना हो जाती है और इसी जाते हुए दिवस की स्मृतियों में हमारा एक वर्ष हमारी जिंदगी का गुजरा हुआ वर्ष हो जाता है। यह सब जानते और देखते हुए भी हम नववर्ष की देहरी पर उसकी पूर्व संध्या के समय उसका भव्य स्वागत करने के लिए रोमांचित होते हैं। सच तो यह है कि कुछ लोग बीते हुए दिनों को भूल जाना चाहते हैं और कुछ लोग यादों के पन्नों को भविष्य के लिए संजो कर रखना चाहते हैं और कुछ वर्ष की घटनाओं को बीते दिनों का हादसा मानते हैं।
                  समय के साथ सामाजिक परिवर्तन की देहरी पर नए समाज के उदय ने हर दिन को रोमांच से भर दिया है। इसमें मध्यवर्गीय भारतीय समाज भ्रमित होकर अंधकार और मझधार में लटके होने की तरह है। पिछले डेढ दशक के भूमंडलीकरण और बाजारवाद ने आदमी को उपभोक्ता में बदल दिया है और उसकी जद में हमारी संस्कृति भी बदलने लगी है। शहरों से सटे गावों में कुछ नवधनाढ्य संपन्न लोगों ने भी अब वर्ष के आखिरी दिन की जाती हुई रात को नववर्ष के शोर-शराबे में बदल दिया है।
                   लेकिन इक्कतीस दिसंबर के जाते हुए इस आखिरी दिन को एक खास मुकाम के साथ देखा जाता है। नव वर्ष के उल्लास में जब सारा विश्व पश्चिमी रंग में रंग जाता है, जिसमें हमारा देश भी अपवाद नहीं रहा है, पार्टियों के जलसे में होटलों और घरों में तथाकथित जश्न होता है, तब देश के आधे से ज्यादा लोग इस तरह के जश्नों से बेखबर रोज की तरह काम में लगे होते हैं और अगली सुबह फिर वही दिनचर्या। कर्ज से दबे हुए किसान एवं लाचार गरीब मजदूर के लिए अभी भी जाते हुए वर्ष एवं आते हुए नववर्ष के लिए कहीं कोई जगह नहीं। अभाव में जीने वाला यह समाज लगता है उस मुख्यधारा से बिल्कुल अलग-थलग और कट गया है जिसे हम देश की प्रगति और विकास की दौड़ कहते हैं। बेरोजगारी से आतुर लोग शहरों में गांवों को ढूंढ़ते हुए स्लम क्षेत्रों की बढ़ोतरी कर रहे हैं।
                     आज की पूर्व संध्या के दिन अब किन अर्थों में बयान किया जाए, क्योंकि इनमें अब कोई अर्थ नहीं बचा है और उजड़ते हुए गांव और खंडहरों को याद करते हुए आज की इस शाम, रात और नए साल की सुबह में उलझ कर रह गए हैं। हमारी नई संस्कृति और विकास में नव वर्ष का ग्लैमर और उसके जश्न की रात है।
                     कुछ लोग कल की सुबह नव वर्ष मुबारक कहेंगे और कुछ लोग रोज की तरह काम की तलाश में उगते हुए सूर्य को देखते चलते जाएंगे। यही सबसे बड़ा अंतर है जब आदमी खास और आम में बंट जाता है और इस पूर्व संध्या पर यही तो दिखाई दे रहा है। फिर भी सबको इस विदा होते साल के अंतिम दिन अलविदा और कल सुबह सबके लिए मंगलमय का संदेश।

                       आपको एवं आपके समस्त परिजनों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामना !!


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