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Monday, 3 December 2018

'देशरत्न' डॉ राजेन्द्र प्रसाद


डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का जन्म भारत माता की सेवा करने के लिए ही हुआ था। उनका जन्म 3 दिसम्बर 1884 को जीरादेई (बिहार) में हुआ था। उनकी मृत्यु 28 फरवरी 1963 को पटना में हुई थी। पूरे उन्नासी वर्षों के उनके जीवन काल पर दृष्टि डाला जाये तो "देशरत्न' का अर्थ समझ में आ जाता है। उनके दादा मिश्री लाल, हथुआ महाराज के दीवान थे। वे बड़े दबंग आदमी थे और राजकाज में बड़े कुशल थे। पिता का नाम महादेव सहाय था और माता का नाम कमलेश्वरी देवी था। माताजी धार्मिक प्रवृति थी। वह सुबह-सुबह प्रभाती गाती थीं। माँ और दादी से रामायण आदि की कथा वे सुना करते थे।

          राजेन्द्र प्रसाद पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटे थे, इसलिए सबके प्यारे थे। तीनों बहनें बड़ी थीं। बड़ी बहन भगवती देवी शादी के बाद कम उम्र में ही विधवा हो गयी थीं। एक बहन बचपन में ही गुजर गयी थीं। तीसरी बहन अनारकली देवी 30 वर्ष की आयु में ही स्वर्ग सिधार गयीं। बड़े भाई महेन्द्र प्रसाद राजेन्द्र बाबू से 8 वर्ष बड़े थे। दोनों भाइयों में बड़ा प्रेम था। बड़े भाई राजेन्द्र बाबू को कोई तकलीफ नहीं होने देते थे। राजेन्द्र बाबू कोई भी नया काम बिना अपने बड़े भाई की अनुमति के नहीं करते थे।

          राजेन्द्र बाबू को बचपन में फारसी पढ़ाने के लिए मौलवी साहब को रखा गया था। बचपन से ही पढ़ने में वे कुशाग्र बुद्धि के थे। पाठ को याद करना, लिखना और दिये गये कार्य को पूरा करने में वे हमेशा आगे रहते थे। बाद में छपरा में पढ़ने आये। एक वर्ष पटना के टी. के. घोष एकेडमी में पढ़े। उस समय राजेन्द्र बाबू के भाई महेन्द्र प्रसाद भी पटना में पढ़ रहे थे। बाद में छपरा जिला स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा दी। उस समय कलकत्ता विश्वविद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा ली जाती थी। इस विश्वविद्यालय के अधीन बिहार, बंगाल, असम,उड़ीसा, बर्मा और नेपाल के विद्यालय हुआ करते थे। मैट्रिक की परीक्षा में राजेन्द्र बाबू सर्वप्रथम आये। गाँव का एक सामान्य लड़का सर्वप्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ है- यह बात सिर्फ बिहार ही नहीं पूरे कलकत्ता विश्वविद्यालय में फैल गयी। लेकिन राजेन्द्र बाबू को इसका तनिक अभिमान नहीं था।

          बड़े भाई महेन्द्र प्रसाद जी कलकत्ता में ही थे। राजेन्द्र बाबू का दाखिला कलकत्ता के कॉलेज में हुआ। इसी बीच वे बीमार पड़ गये। दाखिला का समय समाप्त हो गया था। लेकिन राजेन्द्र बाबू को दाखिला मिल गया। वे क्लास में पैजामा-अचकन और टोपी पहन कर पहुंचे। क्लास में सूट-बूट और हैट में भी बच्चे आये थे। राजेन्द्र बाबू को लगा कि यह सब अंग्रेज बच्चे हैं, लेकिन नाम पुकारने पर पता चला कि वे सभी हिन्दुस्तानी हैं। हाजरी होने लगी तब राजेन्द्र बाबू का नाम नहीं पुकारा गया। उन्होंने उठकर पूछा- मेरा नाम नहीं आया? शिक्षक ने देखा और कहा अच्छा तुम्हारा नाम मदरसा वाले रजिस्टर में होगा। शिक्षक उनके पहनाव से उन्हें मुसलमान छात्र समझ रहे थे। उन्होंने कहा मैं मुसलमान नहीं हूँ। शिक्षक ने पूछा- तुम्हारा नाम क्या? उन्होंने अपना नाम राजेंद्र प्रसाद बतलाया तब सभी लड़के और शिक्षक उनकी ओर मुखातिब हो, हसरत भरी निगाह से देखने लगे। सभी ने उनका नाम तो सुना ही था। पूरे विश्वविद्यालय में वे प्रथम जो आये थे। प्रेसिडेंसी कॉलेज में उनके छात्र काल में राजेन्द्र बाबू की परीक्षा की  'उत्तर पुस्तिका' पर यूज़ जांचने वाले अंग्रेज प्राध्यापक ने एक टिप्पणी लिखी थी 'The Examinee is better than Examiner' 

          1902 में राजेन्द्र बाबू कलकत्ता पहुँचे थे। 1905 में वंग-भंग आन्दोलन शुरू हो गया था। महेन्द्र बाबू इन्हें लेकर सभाओं में जाते थे। राजेन्द्र बाबू के हृदय में यहीं से देश सेवा का अंकुर फूटा। विभिन्न सभाओं में जाने लगे। वहाँ एक संस्था थी डाउन सोसाइटी' (DAWN Society)। इस संस्था में भागनी निवेदिता थी और एक मुखर्जी बाबू थे। राजेन्द्र बाबू इस संस्था से जुड़ गये। वहाँ वे व्याख्यान सुनते थे। फिर भाषण भी देने लगे। उनके भाषण से प्रभावित होकर भागनी निवेदिता ने कहा था यह भारत का भावी नेता हैं।" 'माडर्न रिव्यू' पत्रिका ने लिखा था- इस वक्ता के लिए भविष्य के गर्भ में सब कुछ रखा है। इसमें जरा भी आश्चर्य नहीं है।"

          राजेन्द्र बाबू अल्प आयु में ही अपनी बातों को ठोस तर्क और गंभीरता से रखते थे। 1906 में अखिल भारतीय कांग्रेस की कलकत्ता अधिवेशन में स्वयं सेवक के रूप में भाग लिया। यहां उन्हें विषय निर्धारणी समिति की बहस सुनने का सुअवसर मिला। 1907 में वे कांग्रेस के साधारण सदस्य बन गये। 1911 अखिल कांग्रेस कमिटि सदस्य गये। इन चार वर्षों में उनका कांग्रेस के बड़े नेताओं से परिचय हो गया। लोकमान्य तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, लाला लाजपत राय, मदन मोहन मालवीय, चितरंजन दास, सरोजनी नायडु आदि राजेन्द्र बाबू के प्रमुख प्रशंसक थे।

          1906 में राजेन्द्र बाबू ने बिहारी छात्रों का संगठन बनाना शुरू कर दिया था। "बिहार छात्र संगठन" 1920 तक कार्य करता रहा था। इस संगठन के छात्रों ने 1917 में गाँधी जी के साथ चंपारण आन्दोलन में भाग लिया था।

           राजेन्द्र बाबू को प्रसिडेन्सी कॉलेज से छात्रवृति मिलती रही। पहले वर्ष 30 रुपये की छात्रवृति। अगले वर्ष पुन: प्रथम के पास होने के कारण करीब 80 रुपये की छात्रवृति मिलती रही। 1907 में उन्होंने एम. ए, 1910 में बी. एल. और सन 1915 में एम. एल. पास किया था। एम.एल. में राजेन्द्र बाबू को इतने नंबर आये कि उनका रिकॉर्ड अब तक नहीं टूटा है। 1918 में राजेन्द्र बाबू ने कानून में सफलता पूर्वक 'डॉक्टरेट' संपन्न भी किया।

          इस बीच राजेन्द्र बाबू को दो पुत्र रत्न प्राप्त हुए। 1906 में मृत्युंजय प्रसाद और 1909 में धनंजय प्रसाद। इस बीच कलकत्ता हाई कोर्ट के लोकप्रिय बैरिस्टर शमसुल हुदा साथ वकालत सीखना प्रारंभ किया। उधर कानून की पढाई भी  हो रही था। उनके काम से शमशुल हुदा साहब काफी प्रभावित थे। बाद में राजेन्द्र बाबू ने जब बकाया शुरू की तब पहले दिन के वे जजों की नजर में आ गये। न्यायामूति आशुतोष मुखर्जी की कोर्ट में राजेन्द्र बाबू बहस कर रहे थे। जज साहब ने बहस के बाद उन्हें अपने पास बुलाया और कहा- मैंने तुम्हारा नाम पहले भी सुना था, आज तुम्हारी बहस में काफी प्रभावित हूँ। तुम लॉ कॉलेज में पढ़ाने के लिए समय दो। राजेन्द्र बाबू ने मौन रह कर अपनी स्वीकृति का संकेत दिया। बड़े भाई महेन्द्र प्रसाद से अनुमति प्राप्त कर में वहाँ लॉ कॉलेज में पढ़ाने लगे।

          1916 में पटना उच्च न्यायालय गठन होने पर राजेन्द्र बापू पटना आ गये। 1920 में असहयोग आन्दोलन के दौरान उन्होंने वकालत का पेशा छोड़ दिया। लेकिन जमींदार बाबू हरिजी का मुकदमा डुमराव महाराजा के साथ था। बाबू हरिजी ने उनसे पहले ही वापस ले लिया था कि आप वकालत छोड़ रहे हैं, लेकिन कार पड़ने पर मेरा केस देखते रहेंगे। 1928 में वह मुकदमा प्रिवी कौंसिल, लंदन चला गया। राजेन्द्र बाबू वचन के कायल थे। मुकदमें में वे प्रिवी कौंसिल पहुँचे। मुकदमे में 15 हजार पेज के कागज तैयार थे। बहस के दौरान 15 हजार पृष्ठों के सभी प्रसंगों का को अपनी याद से बतलाते रहे। वहां के बड़े-बड़े अंग्रेज बैरिस्टरों को आश्चर्य होने लगा के भारत का एक मामूली वेश-भूषा का आदमी और कानून में ऐसी योग्यता रखता है।

          फ़रवरी 1910 में गोपाल कृष्ण गोखले कलकत्ता आये थे। उन्होंने राजेन्द्र बाबू को मिलने के लिए बुलावा भेजा।गोखले साहब राजेन्द्र बाबू से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने राजेन्द्र बाबू से सर्वेट ऑफ इंडिया सोसाइटी' में शामिल होने का प्रस्ताव रखा। राजेन्द्र बाबू ने इसे अपना सौभाग्य समझा। तब सोसाइटी अपने स्वयं सेवक को 100 रुपये महीने देती थी। बच्चों की पढ़ाई की  व्यवस्था करती थी। ऐसी स्थिति में बड़े भाई का आदेश लेना उन्होने अनिवार्य रूप। उन्होंने लिखा है--



"कई दिनों की इस प्रकार की चिता को बाद मैंने एक दिन निश्चय किया कि मुझे माननीय गोखले की बात मान कर में उनकी सोसायटी में शरीक हो जाना चाहिए। मेरी हिम्मत नहीं होती थी कि भाई से मैं खुलकर कहूं, क्यूंकि मुझे डर था कि उनको इससे बहुत दुख होगा। मैने उन्हें एक लम्बा पत्र लिखा- वह इस प्रकार है.........।



कलकत्ता
01-03-1910
मंगलवार

पूज्य भाई,

आप एक ऐसे व्यक्ति के पत्र को पाकर आश्चर्यचकित होंगे जो यहाँ आपके साथ रात-दिन बिता रहा है, कुछ बातें हैं जो मुझे आपको लिखने को बाध्य करती है। मैंने अनेक बार अपने मन को बाहें आपसे कहने का विचार किया पर एक भावावेशपूर्ण व्यक्ति होने के कारण में आमने-सामने आपसे बातें वहीं कर सका। मैं आपको विश्वास दिला सकता है कि मैं इस पत्र में जो कुछ कहने जा रहा है वह बिना पूरा-पूरा विचारा हुआ नहीं है।

     आपको याद होगा कि करीब 20 दिन पहले में माननीय गोखले जी से मिलने गया था। मेरे सामने उन्होंने 'सर्वेन्ट्स आफ इंडिया सोसायटी' में सम्मिलित होने के लिए प्रस्ताव रखा। तब से इस प्रस्ताव को व्यवहारिकता के संबंध में मेरा दिमाग चक्कर खा रहा है। इस पर लगातार 20 दिनों तक सोचते रहने के बाद में समझता हूं कि मेरे लिए अच्छा होगा कि मैं अपने भाग्य को देश के साथ मिला दूँ। मैं जानता हूं कि मुझसे - जिस पर परिवार को सारी आशा केन्द्रीभूत है- ऐसी बातें सुनकर आपके हृदय को एक भारी धक्का लगेगा। मैं यह भी जानता हूं कि अगर वे परिवार को अपने आप संभालने को छोड़ दूँ तो परिवार भारी दिक्कतों में पड़ जायेगा। लेकिन मेरे भैया, मैं एक उच्चतर और महत्तर पुकार भी अपने ह्रदय के अंदर महसूस करता हूँ। आपको कठिनाई और बिपत्ति में छोड़ देना मेरे लिए क्रिताघंता हो सकती है, पर मुझे आशा है यह झगड़े का कारण नहीं होगा। मुझे विश्वास है कि हमलोगों का एक- दूसरे के लिए स्नेह और प्यार जरा-जरा सी असुविधाओं को बताने के लिए पर्याप्त प्रबल और पर्याप्त महान है। मुझे विश्वास है कि मैं जो आपको प्यार करता है वह इसलिए नहीं कि आप पारिवारिक कार्यों का प्रबन्ध और हमलोगों की सहायता कर रहे हैं। में यह भी निश्चित मानता है कि आप भी मुझे जो प्यार करते हैं वह इसलिए नहीं कि आप परिवार के लाभ के लिए कुछ कमाने की मुझसे आशा रखते हैं। हमलोगों का प्रेम एक ठोस नींव पर स्थित है और एक-दूसरे के मनमानेपन के कारण कितनी ही असुविधाएँ और तकलीफ हमलोगों को क्यों न उठानी पड़े, हमारे परस्पर प्रेम में कुछ कमी नहीं आयेगी, बल्कि मेरा झुकाव तो इस बात पर विश्वास करने की ओर है कि वह सुदृढ़ तथा टिकाऊ होगा इसलिए मैं आपके सामने प्रस्ताव रखता कि, 30 कोटि के हितार्थ आप मुझे उत्सर्ग करें।

     श्रीमान् गोखलेजी की सोसायटी में सम्मिलित होना मेरे लिए कोई व्यक्तिगत त्याग की बात नहीं है। भले के लिए हो या बुरे के, मुझे इस तरह की शिक्षा पाने का लाभ प्राप्त हुआ है कि मैं जैसी भी परिस्थिति में पड़ जाऊँ, मैं अपने को उसी के अनुकूल बना सकता है। मेरा रहन-सहन भी ऐसा सीधा-सादा रहा है कि मुझे आराम के लिए किसी खास तरह के सरो-सामान की जरूरत नहीं पड़ सकती। सोसायटी से जो कुछ मुझे मिलेगा वही मेरे लिए काफी होगा। पर में यह कहकर अपने को झूठ-मूठ भुला नहीं सकता कि यह आपके लिए कोई त्याग नहीं होगा। आप सभी जो मुझ पर बड़ी आशाएँ बाँधते आ रहे हैं, देखेंगे कि एक क्षण में सारी आशाएँ ढह कर मिट्टी में मिल गई हैं। आप सभी अपने को एक अथाह समुद्र में पड़े हुए पायेंगे, और यह नहीं समझ सकेंगे कि अब क्या करना चाहिए। लेकिन मेरे भैया, याद रखें हम लोगों के घर पर थोड़ी-सी जायदाद है। यदि मैं कमाऊँ तो मैं जानता हूँ  कि मैं कुछ रुपया हासिल कर सकूंगा और शायद इसके द्वारा में उस तथाकथित समाज में अपने परिवार का दर्जा ऊंचा करने में भी समर्थ होऊंगा जहाँ लोग अपनी लम्बी थैली (प्रचुर धन-सम्पत्ति) के कारण ही बड़े गिने जाते हैं, अपने विशाल हदय के कारण नहीं। पर इस क्षणभंगुर संसार में सम्मति, पद-मर्यादा सभी नष्ट हो जाते हैं। लोग जितने ही धनी होते जाते हैं उतनी ही उनकी आवश्यकता भी बढ़ती जाती है। लोग समझ सकते हैं कि धन पाकर हम संतुष्ट होंगे पर जिन्हें कुछ भी ज्ञान है वे अच्छी तरह जानते हैं कि सुख वाह्य कारणों से नहीं मिलता, बल्कि वह हदय की उपज है। एक गरीब अपने थोड़ रूपए से अधिक संतुष्ट रहता है बनिस्बत एक अमीर आदमी के, जिसके पास लाखों रुपये रहते हैं। ऐसी अवस्था में दरिद्रता को तुच्छ नहीं समझना चाहिए। दुनिया के महापुरुष पहले महादरिद्र ही रहे हैं। वे आरम्भ में खूब सताये गये हैं और नीची नजर से देखे गये हैं। पर हंसी उड़ाने वाले और सताने वाले धूल मिल गये, वे अब कभी उठ नहीं सकते और न उनका नाम अब सुना जा सकता है, पर उनके निपातन और उपहास के पात्र, लाखों मनुष्यों की स्मृति में लाखों के हदय में - आज भी वास कर रहे हैं। अतएव उन तथाकथित सामाजिक व्यक्तियों के उपहास और घृणा की परवाह न करें, जिनकी आत्मा और हृदय में वह विशालता नहीं है जो गरीब आदमियों को उन्हें घृणा से नहीं बल्कि दया के भावों से देखने की शक्ति देती है।

     मेरे भैया, आप विश्वास रखें यदि मेरे जीवन में कोई महत्वाकांक्षा है तो वह यही है कि मैं देश सेवा में काम आ सकूँ। हो सकता है कि यह मेरी शिक्षा का दोष है, पर आपको याद होगा- आपने ही पहले पहल इन सुन्दर भावों को, इन उच्च विचारों को मेरे मन में आरोपित किया था। जब मेरे इंग्लैंड जाने की बात हो रही थी, मैं नहीं जानता कि उस वक्त आप क्या सोचते थे या क्या महसूस करते थे, पर मेरी तो आई सी एस की ओर कभी आसक्ति नहीं थी, क्योंकि मैं अनुभव करता था कि उससे मेरी कार्यशीलता बहुत संकुचित हो जायेगी। वह एक अवसर था। जब मैंने अपना हृदय आपके सामने खोल कर रखा था और उसके उत्तर में आपका हृदय भी खुल गया था। वैसा ही यह दूसरा अवसर है। साहस करें और जो मार्ग में पकड़ना चाहता हूँ उस पर चलने में आप अपनी सहमति दें। पर यदि मुझे मालूम हो कि आप सहमति देना नहीं चाहते तो मैं केवल दुखी होऊंगा लेकिन इस पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा। मुझे विश्वास है कि आप सभी मुझे परिवार के लिए आगे की रोटी कमाने वाला समझते हैं। हाँ, अगर आप मुझे केवल उसके लिए ही प्यार करते हैं और यह सोचकर ही मेरा कलेजा टूक-टूक हो जाता है कि हमारे संबंध में ऐसी नीचता और तुच्छता है- तो मैं नहीं जानता कि क्या कहा जाए।

     कृपया मुझे हताश न करें और मुझे अपने प्रति झूठा साबित न होने दें। जो अपने प्रति सच्चा नहीं है वह किसी दूसरे के प्रति कभी सच्चा नहीं हो सकता। यदि आप मुझे रोक रखेंगे तो मेरा शेष जीवन बड़ा दुखमय हो जायेगा। आपने मेरे लिए जो पेशा चुन रखा है उसमें सफलता प्राप्त करना भी सन्देहजनक हो जायेगा। मुझे दुखी बनाना आपका अभिप्राय कभी नहीं हो सकता।

     मैं अभी महत्वाकांक्षा की बात कर रहा था। मेरी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है, सिवाय इसके कि मैं माताजी की कुछ सेवा के काम आ सके। पर मान लिया जाए कि अगर मेरी कोई महत्वाकांक्षा भी होती है तो हाईकोर्ट में मेरी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए कौन सा क्षेत्र है। मैं जानता हूँ कि मैं प्रति मास कई सौ रुपये कमाऊँगा- कई हजार रुपये महीने भी हो सकते हैं- पर क्या दुनिया में ऐसे अनगिनत व्यक्ति नहीं हैं जिनके पास हजारों, लाखों और करोड़ों की पूंजी है पर जिनकी कोई परवाह नहीं करता, और जिन्हें हममें से कुछ लोग दया के अतिरिक्त और किसी भाव से नहीं देख सकते। पर दूसरी ओर सुविशाल क्षेत्र पर दृष्टि डालें, कौन सा राजकुमार, कौन सा जनसाधारण है जिसे एक गोखले के समान प्रभाव, पद या मर्यादा प्राप्त हो? और क्या वे आखिर एक गरीब आदमी नहीं हैं? क्या हमलोग उनके परिवार से भी ज्यादा गरीब हैं? अगर लाखों व्यक्ति दो या तीन रुपये महीने में काम चला लेते हैं तो हमलोग भला सौ रुपये से क्यों नहीं चला सकते। हम लोगों की महत्वाकांक्षा के लिए सुविशाल क्षेत्र होगा। उस पर भी ख्याल करें और मुझे शान्तिपूर्वक जाने हैं। यह आपका ही त्याग होगा, आपका ही गौरव भी।

     अब खर्च के प्रश्न पर विचार करें मुझे अपने-पोषण के वास्ते आपको कुछ देने के लिए कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी- मुझे वह सोसायटी से मिल जायेगा। परिवार पोषण के के लिए भी मुझे कुछ मिलेगा जिसे मैं आपके पास भेजा करूंगा। इससे आपको मुश्किल से ही कुछ सहायता मिल सकेगी परन्तु तो भी कुछ काम की हो सकती है, और अब आपको तीस से संतोष करना होगा जब आप तीन हजार की उम्मीद करते थे। सोसायटी बाल-बच्चों की शिक्षा के लिए भी कुछ देती है। अतएव मैं आपको उन सबों की शिक्षा के लिए प्रबन्ध करने की तकलीफ नहीं ढूंगा। मैं उनकी खुद खबर लूंगा और उन्हें शिक्षा दूंगा।

     मेरे भाई, इस पर विचार करें और अपनी राय बतावें। मैंने लगातार बीस दिनों तक इस पर विचार किया है और अब इस निर्णय पर पहुँचा कि सभी तथाकथित सामाजिक मान-मर्यादा और पद नि:सार दिखावा है- किसी व्यक्ति का बड़प्पन उसके धन की महत्ता पर निर्भर नहीं करता, बल्कि उसके हृदय की विशालता पर निर्भर करता है और मुझे विश्वास है कि आपका हृदय इतना महान है कि जितना दुनिया भर में हो सकता है। फिर दूसरी विचार-दृष्टि से इस प्रश्न पर आइये। मान लीजिये मैं प्लेग से मर गया तो क्या आपको परिवार और उसके कारबार को जो कुछ आपके पास है उसी से, न चलाना पड़ेगा? क्या उस अवस्था में आप अपने भाग्य पर संतोष करने को बाध्य नहीं होंगे? अगर मनुष्य में कुछ देवत्व है, जैसा कि मैं विश्वास करता हूँ कि है, तो क्या उसे स्वेच्छा से इस बात पर राजी नहीं हो जाना चाहिए जिस पर राजी होने के लिए वह बाध्य हो सकता है? यदि देव आपको मुझसे रहित होने को लाचार कर दे तो इसे स्वीकार करने के सिवाय आपके लिए दूसरा चारा नहीं है। अतएव दरिद्रता को स्वेच्छा से अपना कर और थोड़े समय के लिए सामाजिक हीनता को भी स्वीकार कर देवोपम महानता दिखलायें। दिखला दें कि मनुष्य स्वतंत्र विचार और महान हदय रखता है- और दुनिया के समक्ष साबित कर दें कि आज भी दुनिया उच्च विचार वालों से बिलकुल रहित नहीं है। साबित कर दें कि ऐसे मनुष्य भी हैं जिनके लिए रुपये-पैसे तुच्छ वस्तु हैं- निकटतम और प्रियतम की भी, कृतज्ञता का भाजन बनें।

     मैं अपनी पत्नी को भी इसके संबंध में लिख रहा हूं। मैं माताजी को नहीं लिख सकता। वृद्धावस्था में उन्हें इससे भारी कष्ट पहुंच सकता है।

आपका प्यारा,

 राजेन्द्र



महेन्द्र बाबू को चिट्ठी देने के बाद दोनों भाई उसी दिन शाम को कॉलेज स्कवायर में मिले। बड़ी रात तक घंटों बातें होती हा। राजेन्द्र बाबू सर्वेट्स आफ इंडिया सोसायटी में शामिल होने के लिए आग्रह कर रहे थे। आप बहुत देर तक खूब रोते रहे, पर महेन्द्र बाबू आपके जाने की बात से अत्यन्त दुखित थे। दोनों भाई रोते रहे। अंत में राजेन्द्र बाबू ने बड़े भाई की इच्छा को समझकर गोखले साहब की सर्वेट ऑफ इण्डिया सोसाइटी' में न जाने का निर्यण लिया।

          1910 में राजेन्द्र बाबू के हदय में जो देश सेवा का भाव अंकुरित हुआ था, उसको फलने-फूलने का समय आया, जब राजेन्द्र बाबू की मुलाकात गाँधी जी से हुई। फिर उन्होंने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा।

          1917 में राजकुमार शुक्ल के निवेदन पर महात्मा गाँधी पटना पहुंचे, तो सीधे राजेन्द्र बाबू के निवास पर गये। उन्हें राजेन्द्र बाबू के बारे में जानकारी थी। चम्पारण सत्याग्रह के समय राजेन्द्र बाबू अपने साथियों के साथ शामिल हुए। चम्पारण के किसान भोजपुरी बोलते थे। गाँधी जी को उनकी बात समझने में कठिनाई होती थी। राजेन्द्र बाबू किसानों की बातें सुनते और लिखते थे। फिर गाँधी जी को उनकी बातें हिन्दी-अंग्रेजी में बतलाते थे। राजेन्द्र बाबू में कार्य को सुचारू ढंग से चलाने की अद्भुत क्षमता थी। ऊपर से गाँधीजी का प्रभाव था। निलहे साहब की हैकड़ी कुछ ही दिनों बाद खत्म हो गई। सरकार को कानून बनाकर निलहे की ज्यादती पर रोक लगानी पड़ी। निलहे साहब को चम्पारण छोड़कर भागना पड़ा। गाँधी जी ने राजेन्द्र बाबू से कहा था- 'इस आन्दोलन की सफलता विदेशी शासन से भारत की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करेगी। गाँधी के विचार सत्य साबित हुए।

          1918 में राजेन्द्रबाबू ने हिन्दी सेवा का काम शुरू किया इन्दौर में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन गाँधी जी  के सभापतित्व में हुआ। मद्रास में हिन्दी सेवा का कार्य राजेन्द्र बाबू ने देखा बाद में अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन का दो वार्षिक अधिवेशन राजेन्द्र बाबू के सभापतित्व में हुआ। उनके द्वारा तैयार यह संगठन आज भी कार्यरत है। 1920 में गाँधी जी ने अंग्रेजी सरकार से असहयोग करने का आह्वान किया। असहयोग आन्दोलन में शामिल होने के लिए लोगों का आह्वान करते हुए कहा कि आप अपना पेशा, नौकरी और पढ़ाई छोड़कर देश सेवा के लिए आगे आये। राजेन्द्र बाबू ने वकालत का पेशा छोड़ दिया और पूर्णकालीन सेवा गाँधी जी के चरणों में सौंप दी। उन्हीं दिनों पटना कॉलेज के छात्रों ने पढ़ाई छोड़कर देश सेवा के लिए आगे आये छात्रों का समूह राजेन्द्र बाबू से मिलने आया, उसमें जयप्रकाश नारायण भी थे। राजेन्द्र बाबू ने समाज सेवी मजहरूल हक साहब की पटना दीघा के बीच पड़ी जमीन पर विद्यालय बनवाया। सदाकत आश्रम भी उसी जमीन पर बनवाया।

          1930 में नमक-आन्दोलन शुरू हुआ। पटना में बांकीपुर से मंगल तालाब पर जाकर नमक बनाने के लिए जत्था निकला। पुलिस बल ने उस जत्थे को सुलतानगंज थाना के पास रोक दिया। फिर प्रतिदिन बांकीपुर से जत्था जाता था, और उसे सुलतानगंज थाना के पास रोक दिया जाता था। इस बीच गुड फ्रायडे का पर्व आ गया। राजेन्द्र बाबू बिहार के प्रभारी थे। पटना के जिलाधिकारी से जाकर मिले। उन्हें यह सूचना दी कि सत्याग्रही जत्थे गुड फ्रायडे को नहीं निकाली जायेगी। उस दिन आपका पर्व है, आप आराम से उसे मनाये। जिलाधिकारी पर राजेन्द्र बाबू की बात का गहरा असर हुआ। अगले दिन सत्याग्रही जत्थे को जाने की अनुमति दे दी गई लेकिन एक शर्त थी कि वह जत्था ऊपरी सड़क के बदले निचली सड़क से जाए। इस प्रकार अब्दुल बारी साहब के नेतृत्व में नमक कानून तोड़कर मंगल तालाब पर नमक बनाया। गया।

          1930 में राजेन्द्र बाबू की गिरफ्तारी हुई। 15 जनवरी 1934 को बिहार में प्रलयंकारी भूकंप आया था। राजेन्द्र बाबू तब तक बिहार के गाँधी कहे जाने लगे थे। उस समय जेल से बाहर आते ही वे भूकम्प पीड़ितों की सेवा में निकल पड़े। उन्होंने पीड़ितों की सेवा के लिए तीन लाख अस्सी हजार रुपये इकट्ठे किये। जबकि बद्री राय मात्र एक लाख रुपये का ही इंतजाम कर सके थे। बिहार भूकम्प के समय अकेले राजेन्द्र प्रसाद ने जितना काम किया उतना साधन-सम्पन्न सरकारी अधिकारियों ने भी नहीं किया। इस कार्य में जयप्रकाश नारायण एवं अनुग्रह नारायण सिंह ने भी खूब मदद की थी। तब जयप्रकाश जी ने कहा था- गाँधी जी ने अपने दरबार में कई रल रखे थे, लेकिन देशरत्न' राजेन्द्र बाबू ही कहे गये राजेन्द्र बाबू की विद्वता का लोहा सभी मानने लगे थे। कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए राजेन्द्र बाबू का नाम आया। 1934 में ही बड़े भाई महेन्द्र प्रसाद का निधन हो गया था। मालूम हुआ कि घर पर दो लाख का कर्ज है। राजेन्द्र बाबू ने नैतिकता की बात कहकर अध्यक्ष बनने से इन्कार कर दिया। गाँधी जी के पूछने पर उन्होंने बतलाया कि जिस व्यक्ति के ऊपर दो लाख रुपये का कर्ज है उसे अध्यक्ष नहीं बनना चाहिए। गाँधी जी ने सेठ जमना लाल बजाज को बुला कर राजेन्द्र प्रसाद के कर्ज को कैसे समाप्त किया जाय इस पर बात की। जमना लाल बजाज ने अपने मैनेजर को जीरादेई भेजा। पता चला कि जमींदारी तथा कुछ जमीन यदि रेहन पर रख दिया जाय तो कर्ज से मुक्ति हो जायेगी। कर्ज चुकाने का प्रबंध हुआ। अब राजेन्द्र बाबू कांग्रेस के अध्यक्ष बने। उन दिनों कांग्रेस पूरी तरह से अस्त-व्यस्त थी। कार्यालय के लिए कोई स्थान नहीं था।

          कांग्रेस के अध्यक्ष बनते ही, उन्होंने पहले केन्द्रीय कार्यालय खुलवाया। फिर सभी प्रदेशों का दौरा कर वहाँ भी कार्यालय खुलवाये। कांग्रेस का पचासवां साल था। स्वर्ण जयन्ती समारोह का मुख्य कार्यक्रम बम्बई (मुम्बई) में मनाया गया। संगठन क्षमता का परिचय राजेन्द्र बाबू ने दिया। समारोह में लोगों की भागीदारी देखकर अंग्रेजी सरकार दंग थी। अंग्रेजी सत्ता ने सोचा कि भारत की जनता को कुछ उपहार दे दें, अन्यथा असंतोष फैलने पर मुश्किल बढ़ेगी। इसी सोच के साथ भारत में एक कानून लागू किया गया- गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट-1935। उसी वर्ष राजेन्द्र बाबू ने काग्रेस का इतिहास लिखवा दिया। डॉ पट्टाभि सितारमैया द्वारा लिखे गये इतिहास की पांडुलिपि का सम्पादन स्वयं राजेन्द्र बाबू ने किया। उसे हिन्दी, मराठी, कन्नड़, तेलुगु आदि भाषाओं में एक साथ प्रकाशित करवाया गया। देशी रियासतों में 'देशी राज प्रजा मंडलकी स्थापना कराई। राजेन्द्र बाबू के अथक परिश्रम से कांग्रेस सच्चे अर्थों में देश की प्रतिनिधि संस्था बन गयी। राजेन्द्र बाबू द्वारा संगठन को मजबूत बनाने की क्षमता देख कांग्रेस के नेता भी कायल हो गये। बलूचिस्तान के क्वेटा नगर में भयंकर भूकम्प आया। राजेन्द्र बाबू सहायत समिति बनाकर वहाँ जनता की सेवा में जुट गये।

          1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू हुआ। 8-9 अगस्त की रात में सभी नेता गिरफ्तार हो गये। राजेन्द्र बाबू बांकीपुर जेल में रखे गये। यहीं राजेन्द्र बाबू ने अपनी आत्मकथा का लेखन पूरी की। जेल में रहते हुए एक महीने तक प्रतिदिन एक घंटा वे गाँधी जी पर बोलते रहे। उसी के फलस्वरूप 'बापू के कदमों में पुस्तक तैयार हो गई। बापू के सोच की बारीकियों और विशालता को समझने के लिए यह पुस्तक अपने आप में अद्भुत है।

          कांग्रेस पार्टी से सुभाष बाबू के त्यागपत्र देने के बाद कांग्रेस की कमान कौन संभाले पर प्रश्न उठा। सभी ने राजेन्द्र बाबू का नाम लिया। पार्टी की इस विषम परिस्थिति से वही बचा सकते हैं। राजेन्द्र बाबू ने अपना फर्ज निभाया भी।

          17 नवम्बर 1947 को आचार्य कृपलानी जी ने इस्तीफा दे दिया। संकट की घड़ी में फिर राजेन्द्र बाबू से अध्यक्ष बनने को कहा गया। उन दिनों वह दो पद पर कार्यरत थे- एक संविधान सभा के अध्यक्ष पद पर तथा दूसरा केन्द्रीय खाद्य मंत्री का पद था। राजेन्द्र बाबू ने कहा था कि मुझे दोनों पद से हटा दीजिए तब मैं कांग्रेस का अध्यक्ष पद ग्रहण कर सकूँगा। राजेन्द्र बाबू के पास सरदार पटेल और पंडित नेहरू साथ गये थे। नेहरू ने कहा कि उपयुक्त व्यक्ति मिल जायेगा तो आपको मंत्री पद से मुक्त कर दे। लेकिन संविधान सभा में तो आपको रहना ही होगा।

          राजेन्द्र बाबू की विद्वता के कारण ही संविधान सभा का उन्हें अध्यक्ष बनाया गया था। तब उन्होंने कहा था मैं जानता है कि विभिन्न विचार वाले एकमत के लोग यहाँ हैं, यह कार्य आसान नहीं है, फिर भी इस कार्य को पूरा करना हमलोगों का कर्तव्य है। राजेन्द्र बाबू की कठोर मिहनत एवं सूझ-बूझ का ही परिणाम था कि भारत का संविधान शान्तिपूर्ण ढंग से बनकर तैयार हो गया।

          राजेन्द्र बाबू की योग्यता और सूझ-बूझ के कारण ही सवसम्मति से उन्हें भारत का पहला राष्ट्रपति 26 जनवरी 1950 को चुना गया। भारतीय गणराज्य के जनतांत्रिक संगठन बनाने का जिम्मा उन्हीं के सर पर था। राजेन्द्र बाबू ने बड़ी सतर्कता से चुनाव आयोग का गठन किया। मतदाता सूचि का निर्माण करवाया। 1952, 1957 का सफल चुनाव संपन्न करने का श्री उन्ही को जाता है। उनके द्वारा तैयार कांग्रेस का संगठन, भरत का संविधान, चुनाव आयोग, मतदाता सूचि, चुनाव करने की प्रक्रिया, इतनी सुगठित बनी कि आगे की सरकार को उसमे बहुत कुछ करने की छुट नहीं रही। भारतीय गणतंत्र को और यहाँ के जनतांत्रिक संगठन को मजबूत बनाने का श्रेय राजेन्द्र बाबू को ही जाता है। वे कभी रबर-स्टाम्प नहीं रहे।

          कुछ लोगों की मान्यता है कि प. नेहरु के समय कोई कमजोर राष्ट्रपति होता, तो देश में तानाशाही आ जाती। 12 वर्षों तक देश का सर्वोच्च गौरवशाली राष्ट्रपति पद का निर्वहन कर राजेन्द्र बाबू वैसे ही राष्ट्रापति भवान से विदा हुए थे जैसे कोई विद्यार्थी स्कूल में छुट्टी की घंटी बजने पर प्रसन्न होता है। राष्ट्रपति के अपने पुरे कार्यकाल में राजेन्द्र बाबू कभी भी बिहार प्रदेश को नाही  भूले, मिलने वाले बिहारी लोगों से अक्सर वे भोजपुरी में ही बातें करते रहे। भारतीय संस्कृति के साथ बिहार के रीति-रिवाज से कभी विमुख नहीं हुए।



आज राजेन्द्र बाबू की 134 वीं जयंती पर उन्हें कोटिश कोटिश नमन