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Tuesday, 11 September 2018

महादेवी वर्मा ~ हिंदी के विशाल मंदिर की सरस्वती !!

महादेवी वर्मा ~ हिंदी के विशाल मंदिर की सरस्वती !!
        (26 मार्च 1907~ 11 सितम्बर 1987)
नष्ट कब अणु का हुआ प्रयास
विफलता में है पूर्ति-विकास। (-रश्मि)

सन 26 मार्च 1907 में फर्रुखाबाद में, पिता बाबु गोविन्दप्रसाद और माता हेमरानी देवी के घर में छायावाद के उस चौथे स्तंभ का जन्म हुआ जिसे महादेवी वर्मा के नाम से जाना जाता है। बड़े शिक्षित और सुसंस्कृत वातावरण में महादेवी जी ने होश संभाला, कलम थामी और हिंदी काव्य के रजवाड़े में प्रेम दीवानी मीरा ने पुनः जन्म लिया। उन्हें आधुनिक मीरा भी कहा जाता है। निराला ने उन्हें हिंदी के विशाल मंदिर की सरस्वती भी कहा है। 

महादेवी जी की कविताओं में रहस्य की कुहेलिका भरी है। ‘कोई’ है जो अदृश्य है पर निरंतर है। वह कौन है, यह पता नहीं इसलिए वह ‘तुम’ इश्वर है और कवयित्री की हर अभिव्यक्ति पर उस परम सत्ता के साथ किया गया संवाद है। आलोचकों ने इन पर केवल पीड़ा के गीत गाने का दोषारोपण किया है पर कुछ लोगों ने यह कहकर इसका समर्थन नहीं किया है कि यदि जीवन है तो पीड़ा होगी ही और कविता पीड़ा को समझे बिना हो ही नहीं सकती क्यूंकि ‘वियोगी होगा पहला कवी आह से उपजा होगा गान’। पीड़ा का दुखकार पक्ष है तो सुखकर पक्ष भी है और महादेवी जी ने अपनी रचनाओं में पीड़ा के दोनों रूपों को जिस तरह से सज्जा एवं प्रतिष्ठा की है, उस तरह कोई और न कर सका है। निर्गुण प्रेम की उपासिका की कलम मृदुभाषिणी है, उज्जवल है, सात्विक है; यही उनके काव्य-वैवाव की गरिमा है।

अगर आप लोगों ने महादेवी जी की कविताएँ पढ़ी हों, तो आप लोगों ने ज़रूर नोटिस किया होगा कि महादेवी के गद्य और पद्य में बहुत फ़र्क है । महादेवी जी अक्सर कहती थीं कि गद्य सामाजिक मुद्दे और राजनीतिक विषय जैसी चीज़ों के लिए ज़्यादा उचित है, जबकि पद्य प्यार, अलग अलग भावनाओं और ज़िंदगी की अनगिनत रहस्यों के बारे में हो सकता है । इसलिये, महादेवी के गद्य और पद्य अलग अलग विषयों के बारे में हैं और अलग अलग ढंग में लिखा गया है।

महादेवी ने लिखा है ´भाषा सीखना और भाषा जीना एक-दूसरे से भिन्न हैं तो आश्चर्य की बात नहीं।प्रत्येक भाषा अपने ज्ञान और भाव की समृद्धि के कारण ग्रहण योग्य है,परन्तु अपनी समग्र बौद्धिक और रागात्मक सत्ता के साथ जीना अपनी सांस्कृतिक भाषा के संदर्भ में ही सत्य है।´

महादेवी वर्मा ने लिखा है कि ‘कला के पारस का स्पर्श पा लेने वाले का कलाकार के अतिरिक्त कोई नाम नहीं, साधक के अतिरिक्त कोई वर्ग नहीं, सत्य के अतिरिक्त कोई पूँजी नहीं, भाव-सौंदर्य के अतिरिक्त कोई व्यापार नहीं, कल्याण के अतिरिक्त कोई लाभ नहीं। एक महादेवी ही हैं जिन्होंने गद्ध में भी कविता के मर्म की अनुभूति कराई और ‘गद्ध कवीनां निकष वंदति’  उक्ति को चरितार्थ किया। मजेदार बाद यह है कि न तो उन्होंने उपन्यास लिखा, न कहानी, न ही नाटक फिर भी श्रेष्ठ गद्धकार हैं। 

संभवतः महादेवी वर्मा पहली हिन्दी लेखिका हैं जिन्होंने पूंजीवादी समाज में सबसे पहले इस आने वाले संकट को पहचाना था और रेखांकित किया कि हमारी त्रासदी का कारण है संवेदनशीलता का अभाव और भाषा से संवेदनशीलता का गायब हो जाना।

‘नीहार’, ‘रश्मि’, ‘नीरजा’, ‘सांध्यगीत’, ‘दीपशिखा’ आदि इनके प्रसिद्द काव्य ग्रंथ हैं। इनकी ‘यामा’ के लिए इनको ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।
सादर विनम्र नमन💐💐

Monday, 10 September 2018

धरना-प्रदर्शन का इतिहास !!


“नहि ते शूर राधसो अन्तं विन्दामि सत्रा।
दशस्या नो मधवन नू चिद् द्रिवो धियो वाजेभिराविथ।।“
                        (ऋगवेद- 8/64/11)
अर्थात, वैदिक संस्कृति व्यक्ति की मौलिक स्वतंत्रता की उद्घोषक है। कहीं पर भी वेद ने या वैदिक ग्रंथों ने यह घोषणा नही की कि ईश्वर प्रदत्त धन के स्रोतों पर राजा का या राजा के परिजनों का या किसी विशेष मत के मानने वालों का एकाधिकार है। शोषण से मुक्त समाज की स्थापना करना वेद का आदर्श है। जबकि मुस्लिम सुल्तानों ने दूसरों का धन हरण करके खाने को अपना परम कर्तव्य माना।

Protest शब्द की उत्पत्ति फ्रेंच भाषा के 'Protet' से हुआ है, जिसे पहली बार सन 1751 में Statement Of Disapproval के तौर पर रिकॉर्ड किया गया था अर्थात किसी घटना, नीति या परिस्थिति को लेकर आवाज़ उठाने को 'विरोध' करना कहते हैं। अर्थात, जब नाइंसाफी करना क़ानून बन जाए तो विरोध करना हमारा कर्तव्य बन जाता है।
          भारत में शोषण के खिलाफ व्यवस्था के प्रति अपने आक्रोश को, विरोध को प्रदर्शन करने का बहुत ही प्रमाणिक तथ्य नहीं मिलता है कि यह कब से प्रारंभ हुआ है, परन्तु इसके उदहारण जहाँ-तहां इतिहास के पन्नों में अंकित अवश्य मिलते हैं।
          ठीक उसी तरह अपहरण का भी बहुत प्रमाणिक तथ्य हमें उपलब्ध नहीं है कि यह (कु)-प्रथा समाज में कब से प्रचालन में आयी थी। रावण के द्वारा माँ सीता का अपहरण एवं अर्जुन के द्वारा सुभद्रा का अपहरण तथा बहुत बाद के इतिहास में पृथ्वीराज चौहान के द्वारा संजोगिता का अपहरण का हमें प्रमाण मिलता है। जहाँ तक मेरी स्मृति में है कि ब्रिटिश शासन के अंतर्गत बिहार के एक जिला बेतिया(तत्कालीन चंपारण) में एक दुर्दांत अपराधी हुआ करता था जिसके अपराधिक क्रिया कलापों से अंग्रेज सरकार परेशान थी। उस समय के तत्कालीन अंग्रेज पुलिस अधीक्षक ने उस अपराधी तक अपना त्राहिमाम सन्देश भिजवाया और उसे एक सलाह दिया कि इस तरह के अपराध और लुट-पाट से बेहतर है कि क्यूँ न आप उस घर के व्यक्ति का अपहरण कर लेते हैं और बदले में फिरौती की रकम लेकर उसे छोड़ देते हैं--- उस अपराधी को यह सुझाव काफी पसंद आया और इस प्रकार बिहार में अपहरण उद्द्योग की नीवं पड़ी।
          भारत में शासन के प्रति अपने आक्रोश को प्रदर्शित करने का हमें पहला प्रमाण हमें राजस्थान के इतिहासकारों से मिलता है। इतिहासकर बताते हैं कि राजस्थान में 1586 में कवियों के धरने और प्रदर्शन के कई उदारहण मिलते हैं। जोधपुर के तत्कालीन राजा उदय सिंह ने जब उनकी आग्रह पर ध्यान नहीं दिया तब विरोध में 185 कवियों ने एक-एक कर अपनी जान दे दी थी। जोधपुर की नाट्य-संस्था 'रम्मत' अपने नाट्य-मंचन के द्वारा इन कवियों के इस सत्याग्रह को याद करती एवं दिलाती है। मारवाड़ रियासत का ‘आऊआ’ नमक स्थान पर कवियों का समूह धरने पर बैठा था। आऊवा के स्थानीय नागरिक इन कवियों के समर्थन में खड़े थे जबकि जोधपुर के राजा उदय सिंह कवियों से नाराज़ थे। "दरअसल ये सत्याग्रह जोधुपर की तत्कालीन सता के विरुद्ध था, जिसमें कवियों ने राजा को क्षति नहीं पहुंचाई, बल्कि ख़ुद अपने प्राणों की भेंट चढ़ा दी।“ ये प्राचीन धरनों में से एक धरना है। इससे यह प्रमाणित होता है कि भारत में राजशाही के दौर में भी सत्याग्रह की परंपरा रही है
          मुग़ल साम्राज्य में भी हमें कई प्रमाणिक धरने एवं प्रदर्शन का साक्ष्य प्राप्त होता है। जब भारत में मुस्लिम शासन का सूत्रपात हुआ तो उसी समय से हिंदुओं पर ‘जजिया’ कर लगाकर उनका उत्पीडऩ करने का क्रम भी जारी हो गया था। ‘जजिया’ एक प्रकार का धार्मिक कर था जो केवल हिंदुओं से, मुस्लिम शासन में रहने के कारण हिंदुओं को अपने जीवन और संपत्ति की सुरक्षा करता तथा सैनिक सेवा से मुक्त रखने के लिया अदा किया जाता था‘जजिया’ कर इस बात बात को प्रमाणित करती है कि या तो हिन्दू मुस्लिम धर्म को स्वीकार करें, अन्यथा अपने आर्थिक शोषण के लिए तैयार रहें।
          ‘जजिया’ की वास्तविकता को जानकर हमारे देश के लोगों ने उसके विरूद्घ भी जन जागरण किया, विद्रोह किया और सुल्तान को अपनी व्यथा-कथा सुनाकर इस अन्याय परक व्यवस्था को समाप्त करने की प्रार्थना की। अफीफ के अनुसार फीरोज तुगलक अपना शासन शरीयत के प्राविधानों के अनुसार चलाता था। इसलिए उसने ब्राह्मणों से भी जजिया लेना आरंभ कर दिया था।
          जब इस राजाज्ञा की जानकारी ब्राह्मणों को हुई तो वे एकत्रित होकर सुल्तान के पास पहुंचे और उससे अपना आदेश वापस लेने की आग्रहपूर्ण याचना करने लगे, उन्होंने सुल्तान को स्पष्ट कर दिया कि यदि सुल्तान ने उनकी बात नही मानी तो वह स्वयं को जीवित ही जला लेंगे। सुल्तान पर ब्राह्मणों की इस धमकी का कोई प्रभाव नही हुआ। तब ब्राह्मणों ने सुल्तान के निवास ‘कूश्के शिकार’ के बाहर अनशन और प्रदर्शन प्रारंभ कर दिया
          राजधानी के अन्य हिंदुओं को जब ब्राह्मणों के धरना-प्रदर्शन अनशन की जानकारी हुई तो उन्होंने ब्राह्मणों को समझाया कि जजिया के कारण आत्महत्या करना उचित नही होगा। यदि सुल्तान जजिया समाप्त नही करता है, और ब्राह्मणों के विरूद्घ जजिया संबंधी राजाज्ञा पूर्ववत रहती है, तो वह स्वयं ब्राह्मणों की ओर से जजिया भुगतान कर देंगे।

आज वर्तमान परिपेक्ष्य में जब भी आम लोगों की बातचीत में धरना-प्रदर्शन शब्द का ज़िक्र होता है तो हमारे जेहन में जो सबसे पहली बात ध्यान में आती है कि आज कौन से इलाकों में ट्रैफिक जाम लगने वाला है और इससे उन्हें कितनी तकलीफ होगी। कोई ये नहीं सोचता कि जो व्यक्ति धरना प्रदर्शन कर रहा है उसकी तकलीफ क्या है। यानी व्यवस्था से लेकर आम लोगों तक किसी को भी धरना प्रदर्शन से कोई लेना-देना नहीं है। हर कोई इस शब्द को लेकर संवेदनहीन हो गया है क्यूंकि आज ज़्यादातर लोगों के लिए धरना प्रदर्शन का अर्थ सड़क- जाम, नारेबाज़ी, सार्वजनिक संपत्तियों को क्षति पहुँचाना, यातायात के साधनों को सुचारू रूप से न चलने देना, आगजनी, लूटपाट और अफरातफरी का माहौल पैदा करना मात्र होता है। ये अपने आपमें बहुत चिंता की बात है क्योंकि ऐसे हालात में अगर किसी दिन हमें किसी जायज़ मुद्दे के लिए धरना-प्रदर्शन करना पड़ा तो हमारी बात भी कोई नहीं सुनेगा

तथ्य:

दुनिया में सबसे पहला विरोध प्रदर्शन 195 ईसा पूर्व में रोमन साम्राज्य के दौर में हुआ था। इस विरोध प्रदर्शन में महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई थी।

प्राचीन भारत में कर्ज़ से मुक्ति के लिए भूख हड़ताल करने का रिवाज़ था जबकि इतिहास में सबसे पहले भूख हड़ताल का ज़िक्र आयरलैंड में Civil Rights के लिए किया गया है

नमक सत्याग्रह के नाम से भारत के इतिहास में चर्चित दांडी यात्रा भी विरोध के ऐतिहासिक महत्व को दिखाती है।

दुनिया में सबसे लम्बे समय तक विरोध करने का रिकॉर्ड अमेरिका की एक महिला के नाम पर है। परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के विरोध में इस महिला ने 30 वर्षों से ज़्यादा समय तक विरोध प्रदर्शन किया था और जनवरी 2016 में White House के सामने उसकी मौत हो गई।








Sunday, 9 September 2018

संकट में हिमालय !!


समस्त राष्ट्रीय सुरक्षा की उपेक्षा कर भारत की अब तक की तमाम केंद्र सरकारें एवं हिमालय क्षेत्र में स्थित राज्यों की सरकारें नगाधिराज हिमालय के विनाश के लिए कटिबद्ध हो चुकी हैं, जबकि हिमालय के विनाश का अर्थ है संपूर्ण आर्यावर्त की संस्कृति सभ्यता परंपरा एवं वहां के जन सामान्य के जनजीवन का विनाश भारत ही नहीं, अपितु विश्व की समस्त भूगर्भशास्त्रियों एवं मूर्धन्य पर्यावरणविद ने अनावश्यक रुप से हिमालय के साथ छेड़छाड़ करने को समस्त उत्तराखंड ही नहीं अपितु संपूर्ण उत्तर संपूर्ण भारत के विनाश के लिए खुली चुनौती के रूप में स्वीकार किया है; क्योंकि हिमालय एक संवेदनशील पर्वत है इसकी विशेषता, महत्ता एवं उपयोगिता विश्व के अन्य पर्वतों से अधिक है; क्यूंकि इस पर अनेक जीवनदाई वृक्ष-वनस्पतियों, औषधियां तो प्राप्त होती है, जल का विशाल स्त्रोत भागीरथी गंगा के रूप में भी हमें उपलब्ध होता है यमुना को छोड़कर उत्तराखंड की समस्त नदियों का मिलन गंगा में उत्तराखंड की भूमि में ही होता है जो इतना संवेदनशील पर्वत हो, उस पर गंगा जैसी नदी को रोककर अनेकों बाँध बनाना तथा उसके समस्त प्राकृतिक मार्ग को अवरुद्ध कर सुरंगों से निकालना एक भयंकर विनाशकारी प्राकृतिक आपदा का निमंत्रण देना ही है सुरंगों के निर्माण में जितने बारूद एवं विस्फोटक सामग्री का प्रयोग होता है,से आस-पास रहने वाले सामान्य जीव-जंतु से लेकर हिमालय के पुत्र मनुष्यों पर इतना विनाशकारी प्रभाव पड़ रहा है कि वहां का पर्यावरण दूषित हो जाएगा और जापान के नागासाकी तथा हिरोशिमा- जैसी भयावह स्थिति उत्पन्न हो जाएगी ऐसी परिस्थिति में पर्वत पुत्र हिमालय वासियों को अपनी जन्मभूमि का परित्याग करने के लिए या उसी दूषित वातावरण में रहकर जीवन नष्ट करने के लिए विवश होना पड़ेगा हमारी सरकारें अपनी अदुर्दर्शिता के कारण इस भयावह सत्य स्वयं समझती है और जनता को समझने देती है गंगा जैसी विशाल, सदानीरा, सतत प्रवाहमान नदी को केवल तुच्छ लाभ (विद्युत-उत्पादन) के वशीभूत होकर प्रदेशवासियों एवं देशवासियों को मिथ्या विकास दिखाकर (वास्तव में विनाश) सरकार उनसे छल कर रही है।
          टिहरी बांध की योजना की पोल तो खुल ही चुकी है, जिसके संबंध में महान लाभों का सपने दिखा कर स्थानीय जनता एवं प्रदेशवासियों को धोखा दिया गया था वैज्ञानिकों के द्वारा इस बांध के निर्माण की योजना को अस्वीकार किए जाने पर भी विदेशी ऋण प्राप्त करने के लोग में जब इसका निर्माण अपनी हठधर्मिता के कारण सरकार ने प्रारंभ किया, तब अनेक दूरदर्शी व्यक्तियों ने बांध-निर्माण की हानी को दर्शाते हुए अनेकों लेख लिखे तथा वहां जाकर उस स्थ का निरीक्षण भी किया वहां के निवासियों को क्रूरता पूर्वक उजाड़ दिया गया बिना कुछ व्यवस्था के ही  दर-दर भटकने के लिए विवश किया गया तथा आज तक भी निर्वासित पर्वत पुत्र हिमालय वासियों के पुनर्वास में कोई समुचित व्यवस्था नहीं की गई बांध की चपेट में आने वाले भू-भागों में अनेक प्रकार की दुर्लभ एवं दिव्य औषधियों का विनाश तो हुआ ही, वहां का पर्यावरण भी भयंकर रूप से प्रभावित हुआ स्थानीय लोगों का कहना है कि टिहरी बांध से पहले तथा सुरंगों में गंगा को डालने से पूर्व यहां कोहरा नहीं पड़ता था यहां तक कि हम कोहरे के विषय में अपरिचित से थे अब प्रातः १० बजे तक कभी-कभी तो पुरे दिन ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश एवं पंजाब, हरियाणा की भांति यहाँ कोहरा पड़ता है जहाँ प्रातः काल जनवरी-फरवरी के महीने में धूप खिली रहती थी, वहीँ अब दिन-भर कोहरा छाया रहता है,जिससे वहां की वृक्ष-वनस्पतियाँ, जो टिहरी बांध के जलागार में नहीं आई थी अर्थात उसकी सीमा से बच गई थी दुष्प्रभावित हो गई है।
          किसी भी सरकार को वहां के नागरिकों के ऊपर अत्यंत नृशंस अत्याचार करने का अधिकार नहीं है, परंतु विडंबना है कि यह सब कुछ अकल्पनीय अत्याचार राजतंत्र में नहीं, अपितु विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाने भारत में ही हुआ है और हो रहा है अनेक वर्ष हो गए जिस कुंड को बरसाती जल से भरने की योजना बताई गई एवं जनता को झूठा आश्वासन दिया गया, वह कुंड मार्च, अप्रैल, मई में आश्वासन के विरुद्ध उस जल से भरा जाने लगा, जिससे कृषक अपना खेत सींचते थे, उनके सामने समस्या हुई और हाहाकार मचा सुना जाता है कि जितने जल से टिहरी बाँध का विशाल सरोवर भरा जा सकता था, उससे अधिक जल उसमें में आ चुका है, किंतु वह आज भी अपूर्ण है विशेषज्ञों एवं प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार जल दोनों की पहाड़ियों के नीचे जा रहा है और अब तो पार्श्ववर्ती पहाड़ियाँ नीचे धंसने लगी है और उसमें दरार भी आ गई है यह सारे ही लक्षण हिमालय के विनाश की सूचना दे रहे हैं, किंतु प्रजातांत्रिक जाने वाली सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगती हुई दिखाई देती है सरकार दृष्टिहीन एवं मूक बनी हुई है जब उस भयानक कुकृत्य को रोकने के लिए सरकार पर प्रभाव डाला जाता था तो वहां से जो उत्तर आता था वह किसी स्वस्थ मस्तिष्क का परिचायक नहीं होता था सरकार का मानना है कि इस कार्य पर बहुत अधिक रुपया किया जा चुका है इसलिए अब रोकना उचित नहीं है, जो मूर्खतापूर्ण ही नहीं बल्कि बौद्धिक दिवालियेपन की प्रतिक है वास्तविकता यह है कि इस बांध तथा अन्य बांधों के निर्माण की योजना प्रकृति के कोप को आमंत्रित करने वाली है यह गंगा का विनाश अत्यंत हानिकारक होगा।
          यही नहीं, इस प्रकार से गंगा के विनाश के साथ ही उत्तराखंड एवं हिमालय का विनाश कर हिंद महासागर एवं अरब सागर से उठने वाला मानसून को रोककर समस्त उत्तर भारत, पूर्वोत्तर प्रदेश तथा पश्चिम प्रदेश; यहां तक की संपूर्ण भारत को मानसून-वृष्टि के द्वारा हरा-भरा बनाने वाले तथा जीवन प्रदाता हिमालय का विनाश करने वाले लोग भयंकर राष्ट्र घातक कहे जा सकते हैं; क्योंकि हिमालय के विनाश से भारत का पूर्ण भूभाग मरुभूमि में परिणत हो जाएगा अपने संतानों की जीवन की रक्षा एवं विश्व-पर्यावरण की सुरक्षा के लिए हिमालय की प्राणभूत गंगा का विनाश करना अक्षम्य अपराध है यह हमारा दायित्व है कि हम गंगा को प्राकृतिक रूप में बहने दें तथा उसके प्राकृतिक रूप में प्रवाहमान स्थिति में जो कुछ अपना सहयोग कार सकते हैं, करें गंगा बचेगी तो हिमालय बचेगा और हिमालय बचेगा तो भारत बचेगा गंगा का विनाश हिमालय का विनाश है और हिमालय का विनाश आर्यावर्त राष्ट्र का है और तब हम यह कैसे कह पाएंगे कि हमारे देश की उत्तर दिशा में पर्वतराज हिमालय है जो पृथ्वी के मानदंड सदृश है

अतः पृथ्वी के इस मानदंड की रक्षा करना हम-आप सभी का धर्म एवं पुण्य कर्म है

Friday, 7 September 2018

धारा 377 का निरस्त्रीकरण ~ भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात !!


नाहं जानामि केयूरे नाहं जानामि कुण्डले
नूपुरे त्वभिजानामीनित्यं पादाभिवंदनात्त।।
श्रीराम ने जब लक्ष्मन को वन में मिले बिखरे आभूषण को दिखाते हुए पूछा था कि जरा इन्हें पहचान कर बताओ तो, क्या यह जानकी के ही आभूषण हैं। उत्तर में लक्ष्मन ने कहा मैं इन केयूरों को नहीं पहचान सकता; क्यूंकि यह हाँथ के आभूषण हैं और न ही इन कुण्डलों को। मैं तो सिर्फ पैरों के नुपुर को ही पहचान सकता हूँ क्यूंकि मैंने माता जानकी को उनके चरणों से ऊपर देखा ही नहीं है........जिस संस्कृति का वाहक और पोषक हमारा यह देश रहा है, वहां की माननीय सर्वोच्च न्यायलय की खंडपीठ यह यह व्याख्या करती है कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 अप्रासंगिक है.....इससे हमारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता बाधित होती है। तब मुझे मैकाले की वह पंक्ति स्मरण हो रही है कि यदि किसी देश की उन्नति एवं विकास को छिन्न-भिन्न करना हो.........तो उसकी संस्कृति पर ही सीधा कुठाराघाट करो.....देश स्वतः कमजोर हो जाएगी।'  
          मानीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा धारा 377 के तहत समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के साथ ही 158 साल पुराने इस औपनिवेशिक कानून के संबंधित हिस्से को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया और कहा कि यह समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है, और इसके साथ ही भारत उन 25 अन्य देशों के साथ जुड़ गया जहां समलैंगिकता वैध है अर्जेंटीना, ग्रीनलैंड,  दक्षिण अफ्रीका,  आस्ट्रेलिया,  आईसलैंड,  स्पेन, बेल्जियम, आयरलैंड, अमेरिका, ब्राजील, लक्जमबर्ग, स्वीडन और कनाडा इत्यादि देशों में समलैंगिक संबंध वैध हैं
          आदिम युग में भी जब सेक्स संबंधों को लेकर किसी तरह का नैतिक बोध और मानदंड विकसित नहीं हुआ था, तब होमोसेक्शुअल संबंध आम थे। प्राचीन महान सभ्यताओं में भी समलैंगिकता को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। लगभग पांच हजार साल पहले असीरिया में समलैंगिक संबंधों का प्रचलन था और इसे अस्वाभाविक अथवा काम-विकृति नहीं माना जाता था। प्राचीन मिस्र में होरस और सेत जैसे प्रमुख देवताओं को समलैंगिक बताया गया है। प्राचीन यूनान एवं रोम में भी समलैंगिकता को बुरा नहीं माना जाता था।
          पुनर्जागरण काल में यूरोप भी इससे अछुता नहीं था। दांते ने अपने गुरु लातिनी के बारे में लिखा है कि वह समलैंगिक थे। प्रसिद्ध दार्शनिक रूसो ने लिखा है कि युवावस्था के दौरान उसमें समलैंगिक मैथुन के प्रति तीव्र आकर्षण था। मानवतावादी विचारक और कवि म्यूरे भी समलैंगिक थे और इस वजह से उनका जीवन खतरों से भरा था, क्योंकि उस वक्त समलैंगिकता उजागर हो जाने के बाद कठोर दंड का प्रावधान था। मध्यकाल यानी जिसे यूरोप में अंधकार का युग कहा जाता है, समलैंगिकों को जिंदा जला दिया जाता था।
          वात्स्यायन के कामसूत्र में भी समलैंगिकता का उल्लेख है, जिसे उन्होंने अनुचित बताया है। होमो-सेक्स के विषय पर काफी शोध हुए हैं। जर्मन चिकित्सक मैग्नुस हिर्श फेल्ड(1868-1935) की 1914 में प्रकाशित पुस्तक Die Homosexeualitatको इस विषय का विश्वकोश माना गया
          फ्रायड का मानना है कि सारे मनोरोग का मूल कारण सेक्स है। इसे वह सेक्स मनोग्रस्तता कहते हैं। उनक मानना था कि समूचा पश्चिम इसी रोग से ग्रसित है, जो हर वक्त सेक्स की ही बात सोचता रहता है। खुद फ्रायड इस रोग से ग्रसित थे। फ्रायड का शिष्य कार्ल गुस्ताव जुंग के अनुसार मृत्यु का भय ही मूल रूप से सभी मनोरोगों का कारण है जिससे समूचा पूरब ग्रसित है और वह दिन-रात मृत्यु को लेकर भयभीत रहता है।
          भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वाधिक प्राचीनतम एवं समृद्ध संस्कृति है। संस्कृति और संस्कार दोनों ही कृ धातु से बने हैं। संस्कृति की अभिव्यक्ति आचार-विचार, रीति-नीति,वेश-भूषा द्वारा होती है। सोलह संस्कारों द्वारा जीवन को सुसंस्कृत कर वर्णाश्रम धर्म के अनुसार दैन्निदनीय कृत्यों को संपन्न करना हिन्दू-संस्कृति का पुनीत मानवीय कर्तव्य मन गया है। अन्य देशों की संस्कृतियाँ तो समय के साथ-साथ नष्ट होती रही हैं, किन्तु भारत की संस्कृति आदि काल से ही अपने परम्परागत अस्तित्व के साथ अजर-अमर बनी हुई है। इसकी उदारता तथा समन्यवादी गुणों ने अन्य संस्कृतियों को समाहित तो किया है, किन्तु अपने अस्तित्व के मूल को सुरक्षित रखा है। भारत में नदियों, वट, पीपल जैसे वृक्षों, सूर्य तथा अन्य प्राकृतिक देवी–देवताओं की पूजा अर्चना का क्रम शताब्दियों से चला आ रहा है। देवताओं की मान्यता, हवन और पूजा-पाठ की पद्धतियों की निरन्तरता भी आज तक अप्रभावित रही हैं। वेदों और वैदिक धर्म में करोड़ों भारतीयों की आस्था और विश्वास आज भी उतना ही है, जितना हज़ारों वर्ष पूर्व था। गीता और उपनिषदों के सन्देश हज़ारों साल से हमारी प्रेरणा और कर्म का आधार रहे हैं। किंचित परिवर्तनों के बावजूद भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्त्वों, जीवन मूल्यों और वचन पद्धति में एक ऐसी निरन्तरता रही है, कि आज भी करोड़ों भारतीय स्वयं को उन मूल्यों एवं चिन्तन प्रणाली से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं और इससे प्रेरणा प्राप्त करते हैं। अपनी प्राचीन संस्कृति को बचाए रखने में सबसे महत्वपूर्ण ज्यादा महत्वपूर्ण योगदान 'गृहस्थ आश्रम' का है। भारत में विवाह को एक संस्था का दर्जा प्राप्त है।
          आज भारत पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति से प्रभावित होता जा रहा है। वर्तमान पीढ़ी अपनी गौरवमयी संस्कृति  रूपी विरासत से वंचित होती जा रही है। वह सब धर्म, कर्म एवं पुनीत संस्कारों से विमुख होकर सुख-शांति चाहती है, परन्तु उसकी यह कामना मृग मरीचिका मात्र ही सिद्ध हो रही है।
यत्र त्वेत्त्कुल्ध्वंसा जायन्ते वर्णदूषकाः।
राष्ट्रिकै:  सह तद राष्ट्रं क्षिप्रमेव विनश्यति।।
     अर्थात धर्म और संस्कार से विहीन प्रजा स्वतः अपने साथ देश और समाज का विनाश कर देती है।


40 के दशक में प्रकाशित हुई इस्मत चुगतई की उर्दू कहानी 'लिहाफ' स्त्री समलैंगिकता की पहली कहानी है, जिसने उस ज़माने में सनसनी मचा दी थी। नागार्जुन के उपन्यास 'रतिनाथ की चाची' में भी समलैंगिकता का चित्रण हैपांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' की आत्मकथा 'अपनी ख़बर' में युवकों और किशोरों की समलैंगिक प्रवृत्तियों का यथार्थ वर्णन मिलता हैदेवराज चानना की पुस्तक 'प्राचीन भारत में दास प्रथा' में ऐसे वर्णन मिलते हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि समलैंगिक संबंधों के लिए दासों व निम्न वर्ग के युवा लड़कों का इस्तेमाल भद्र जन किया करते थे।

माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने भा. दंड सहिंता की धारा 377 के आलोक में जो अपना निर्णय दिया है कि कोई भी युवक-युवती कभी भी अपने इच्छानुसार बिना विवाह के एक साथ रह सकते हैं, घूम-फिर सकते हैं तथा स्वेच्छाचार पूर्वक अपने निजी पलों को व्यतीत कर सकते हैं। यह उनका अधिकार है तथा धारा 377 वर्तमान परिपेक्ष्य में अनुकूल नहीं है। पिछले दिनों ट्रांस जेंडर को समाज में मान्यता देकर माननीय न्यायलय ने एक अच्छी पहल की शुरुआत की है, परन्तु लिव इन रिलेशनशिप और अब समलेंगिकता को लेकर जो माननीय न्यायलय की खंडपीठ का फैसला है इसका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा, जिससे परिवार जैसी मजबूत इकाई के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगेगा माननीय न्यायलय के इस खंडपीठ के निर्णय पर कुछ भी मंतव्य जाहिर करना कानून- सम्मत एवं न्याय-संगत तो नहीं है, परन्तु इतना तो अवश्य ही कहा जा सकता है कि यह सब युग एवं पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव है।