Monday, 21 May 2018

ह्वेनसांग की भारत यात्रा।।

अपने बुक सेल्फ से~
एक प्रामाणिक ऐतिहासिक दस्तावेज जिसे स्वयं ह्वेनसाँग ने अपनी भारत यात्रा के दौरान हुए संस्मरण को  ' ह्वेनसांग की भारत यात्रा(सन 629 से सन 645 तक) में लिपिबद्ध किया है।

इस ऐतिहासिक दस्तावेज में तत्कालीन समय की राजनीतिक, सामरिक, आर्थिक, वैचारिक एवं सामाजिक स्थितियों-परिस्थितियों का विस्तृत रूप से वर्णन किया है।
यह पुस्तक उन तमाम पाठकों की ज्ञान-क्षुधा की पूर्ति करती है जिन्हें अपने खोए हुए स्वर्णिम भारत को जानने की सदैव से ललक रही है।

ह्वेनसाँग के मूल पांडुलिपी का संपादन में डॉ शाहिद अहमद जी एवं इस मूल पांडुलिपी के अनुवाद में ठाकुर प्रसाद शर्मा जी का विशेष योगदान है जिन्होंने कठिन परिश्रम से उस समय प्रयुक्त होने वाली शब्दों को खोज-खोज कर निकालने में असाध्य परिश्रम किया है और जन सामान्य तक पहुँचाने का दुर्लभ कार्य किया है।

इस पुस्तक के प्रकाशक ' सहित्यागार ',  चौड़ा रास्ता, जयपुर, राजस्थान भी विशेष धन्यवाद का पात्र है जिसने 419 पन्ने की इस अमूल्य दस्तावेज को सन 2006 में पहली बार प्रकाशित किया था।

पुस्तक का नाम
ह्वेनसाँग की भारत यात्रा(सन 629 से सन 645 तक)
ISBN--- 81-7711-104-3

आशा है यह पुस्तक रूपी दस्तावेज निश्चित ही हमे अपने स्वर्णिम अतीत को पुनः एक बार बहुत ही नजदीक से एक यात्री के अपने संस्मरणों के माध्यम से जानने-समझने और मनन करने में अभूतपूर्व सहयोग प्रदान करेगी।

Tuesday, 1 May 2018

भोगतंत्र और दादातंत्र के बीच पिसता आज का मजदूर वर्ग !!


मई दिवस जिस उल्लास और जोशोखरोश के साथ मनाया जाता था वह जोशोखरोश गायब है। मजदूर वर्ग गंभीर संकट में है, यह संकट बहुआयामी है। नोटबंदी के बाद से पनपे आर्थिक संकट में पूंजीपतियों ने किसी तरह से अपने को उबारने के प्रयास में सफल तो रहे परन्तु इसका समुचित हिस्सा या लाभांश मजदूरों तक नहीं पहुँचा है।
          इस आर्थिक समस्या से पूंजीपति वर्ग को कम और मजदूरों को ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है। इस संकट की मार से मजदूरों को बचाने के लिए सरकार ने कोई भी विकासमूलक या मजदूरों की मदद करने वाला कोई भी ठोस या जमीनी कदम नहीं उठाया। आर्थिक तंगी के मार के बावजूद पूंजीपति वर्ग के मुनाफों में कमी नहीं आई जबकि मजदूरों की कंगाली कई गुना बढ़ी है। बेकारी कई गुना बढ़ी है। हजारों कारखाने/प्रतिष्ठान बंद हो गए हैं। मंहगाई आसमान छूने लगी। इसके बावजूद हमारी केन्द्र सरकार ने मजदूरों की रक्षा के लिए, आर्थिक मदद के लिए एक भी कदम नहीं उठाया।
          सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने से सरकारी मजदूरों और कर्मचारियों का एक तबका खुश था कि नया वेतनमान आया, लेकिन मंहगाई की छलांग ने नए वेतनमान की खुशी को गायब कर दिया है। जिस गति से सरकारी कर्मचारियों के वेतन बढ़े हैं उसकी तुलना में निजी क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों की वेतन सिर्फ कम ही नहीं हुई बल्कि नियमित रोजगार की भी संभावना क्षीण हुई है। 
          आज की सच्चाई यह है कि केन्द्र सरकार सैन्य और अर्द्ध सैन्यबलों पर जितना खर्च कर रही है उतना विकास पर नहीं। मसलन् पकिस्तान और चीन जैसे देशों से सामरिक समानता के लिए आज सैन्य एवं अर्द्ध सैन्य बलों के आपरेशन पर जितना पैसा खर्च किया जा रहा है, हथियार खरीदने और अस्त्र-शस्त्र तैयार करने पर जितना खर्च किया जा रहा है उतना पैसा गरीबों तक खाद्य सामग्री, स्कूल बनाने, अस्पताल खोलने पर खर्च नहीं हो रहा है।
          हमारे देश में लोकतंत्र है लेकिन समग्रता में वृहद दृष्टिकोण से देखें तो राज्य की लोकतंत्र वार स्टेटकी इमेज दिखाई दे रही है। यह बड़ी भयानक छवि है। उत्तर-पूर्व में सेना घरेलू मोर्चा संभाले है। कश्मीर में सेना घरेलू मोर्चा संभाले है। नक्सलवाद प्रभावित 136 जिलों में हजारों अर्द्ध सैन्यबल घरेलू मोर्चा संभाले हैं, ऐसी अवस्था में सोचें कि देश में कितने कम इलाके हैं जहां लोकतंत्र की हवा बह रही है? जो इलाके युद्धतंत्र और दादातंत्र से बचे हैं वहां भोगतंत्र ने कब्जा जमा लिया है।
          दादातंत्र(कैडर) के कारण पश्चिम बंगाल जैसा सुंदर मजदूर राज्य नष्ट हो चुका है। दादातंत्र ने मजदूरवर्ग को सबसे ज्यादा क्षतिग्रस्त किया है। दादातंत्र मूलतः युद्ध तंत्रका जुड़वां भाई है। मजदूरवर्ग के लिए ये दोनों ही फिनोमिना नुकसानदेह हैं। इससे आम मजदूर की हालत खराब हुई है। धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक राष्ट्र गायब हो गया है। अब तो धर्मनिरपेक्षता-लोकतंत्र किताबों के पन्नों में ही दिखते हैं बाहर तो दादातंत्र ,युद्धतंत्र और भोगतंत्र के ही दर्शन होते हैं।
अब साधारण आदमी और खासकर मजदूर, राजनीति में भाग लेना पसंद नहीं करता। अपराधीकरण बढ़ा है। मजदूर वर्ग में वर्गीय चेतना का ह्रास हुआ है और नग्न अर्थवाद और भोगवाद बढ़ा है। मजदूरों में संस्कृति की बजाय मास कल्चर का प्रभाव बढ़ा है। मार्क्सवादी विश्व दृष्टिकोण की बजाय स्थानीयता वाद बढ़ा है।
          श्रम और श्रमिक वर्ग के प्रति घृणा में वृद्धि हुई है। यह सब इस लिए हुआ क्योंकि मजदूर नेताओं ने मजदूर वर्ग को दलीय चुनावी राजनीति का गुलाम बना दिया, दलीय चुनावी हितों को मजदूर वर्ग के हितों की तुलना में तरजीह दी। फलतः आम वातावरण से लोकतंत्र और मजदूर वर्ग गायब हो गया है। काश, बुद्धिजीवी वर्ग इस वर्ग की परेशानियों एवं जटिलताओं को समझ पाते।
"Proletarier aller Länder, vereinigt euch"- 
             karl Marx & Friedrich Engels(1848)
English Version ~  "Proletariat of all countries , unite."
Popularised Version~ " Workers of the world, unite."

Friday, 13 April 2018

RAPE

There is no difference between being raped and being pushed down a flight of cement steps except that the wounds also bleed inside. There is no difference between being raped and being run over by a truck except that afterward men ask if you enjoyed it. There is no difference between being raped and being bit on the ankle by a rattlesnake except that people ask if your skirt was short and why you were out alone anyhow. There is no difference between being raped and going head first through a windshield except that afterward you are afraid not of cars but half the human race. The rapist is your boyfriend’s brother. He sits beside you in the movies eating popcorn. Rape fattens on the fantasies of the normal male like a maggot in garbage. Fear of rape is a cold wind blowing all of the time on a woman’s hunched back. Never to stroll alone on a sand road through pine woods, never to climb a trail across a bald without that aluminum in the mouth when I see a man climbing toward me. Never to open the door to a knock without that razor just grazing the throat. The fear of the dark side of hedges the back seat of the car, the empty house rattling keys like a snake’s warning. The fear of the smiling man in whose pocket is a knife. The fear of the serious man in whose fist is locked hatred. All it takes to cast a rapist to be able to see your body as jackhammer, as blowtorch, as adding-machine-gun. All it takes is hating that body your own, your self, your muscle that softens to flab. All it takes is to push what you hate, what you fear onto the soft alien flesh. To bucket out invincible as a tank armored with treads without senses to possess and punish in one act, to rip up pleasure, to murder those who dare live in the leafy flesh open to love.



                                                                        Rape  
There is no difference between being raped                  बलात्कार किये जाने और
and being pushed down a flight of cement steps           सीमेंट के खड़े जीने से धकेल दिये जाने में
except that the wounds also bleed inside.                      कोई फर्क नहींसिवाय इसके कि
                                                                                                       उस हालत में भीतर-भीतर रिसते हैं ज़ख्म.

There is no difference between being raped                   बलात्कार किये जाने और
and being run over by a truck                                          ट्रक से कुचल दिये जाने में
except that afterward men ask if you enjoyed it.             कोई फर्क नहीं, सिवाय इसके कि 
                                                                                        उसके बाद मर्द पूछता है –मज़ा आया ?

There is no difference between being raped                   बलात्कार किये जाने और
and being bit on the ankle by a rattlesnake                     किसी ज़हरीले नाग के काटने में
except that people ask if your skirt was short                  कोई फर्क नहीं, सिवाय इसके कि
and why you were out alone anyhow.                             लोग पूछते हैं क्या तुमने छोटा स्कर्ट पहना था
                                                                                        और भला क्यों निकली थी घर से अकेली.

There is no difference between being raped                   बलात्कार किये जाने और
and going head first through a windshield                      शीशा तोड़कर सर के बल निकलने में
except that afterward you are afraid                               और कोई फर्क नहीं, सिवाय इसके कि
not of cars                                                                       तुम डरने लगती हो
but half the human race.                                                 गाड़ी से नहीं, बल्कि मर्द ज़ात से.
                                                                                                     
                                                                                                      
                                                                                                      
                                                                                                      
The rapist is your boyfriend’s brother.                          बलात्कारी तुम्हारे प्रेमी का भाई है.
He sits beside you in the movies eating popcorn.        वह सिनेमाघर में बैठता है तुमसे सटकर पॉपकॉर्न खाता हुआ.
Rape fattens on the fantasies of the normal male        बलात्कार पनपता है सामान्य पुरुष के कल्पनालोक में
like a maggot in garbage.                                             जैसे कूड़े की ढेर पर गोबरैला.

Fear of rape is a cold wind blowing                              बलात्कार का भय एक शीतलहर की तरह बहता है
all of the time on a woman’s hunched back.                 हर समय चुभता किसी औरत के कूबड़ पर.
Never to stroll alone on a sand road through pine woods,   सनोबर के जंगल से गुजरती रेतीली सड़क पर
                                                                                               कभी अकेले नहीं टहलना,



never to climb a trail across a bald                                   नहीं चढ़ना किसी निर्ज़न पहाड़ी पगडण्डी पर
without that aluminum in the mouth                                  बिना मुँह में चाक़ू दबाए
   when I see a man climbing toward me.                         जब देख रही हो किसी मर्द को अपनी ओर आते.


Never to open the door to a knock                                     कभी मत खोलना दरवाज़ा किसी दस्तक पर
 without that razor just grazing the throat.                           बिना हाथ में उस्तरा लिये.
 The fear of the dark side of hedges                                    हाते के अँधेरे हिस्से का भय,
 the back seat of the car, the empty house                         कार की पिछली सीट काभय खाली मकान का
 rattling keys like a snake’s warning.                                  छनछनाती चाभियों का गुच्छा जैसे साँप की चेतावनी
 The fear of the smiling man                                              उसकी जेब में पड़ा चाकू इस इंतज़ार में है
 in whose pocket is a knife.
The fear of the serious man                                              
कि धीरे से उतार दिया जाय मेरी पसलियों के बीच.
 in whose fist is locked hatred.                                           उसकी मुट्ठी में बंद है नफरत.

All it takes to cast a rapist to be able to see your body      बलात्कारी की भूमिका में उतरने के लिये काफी है
as jackhammer, as blowtorch, as adding-machine-gun.     कि क्या वह देख पाता है तुम्हारी देह को,
All it takes is hating that body                                              छेदने वाली मशीन की नज़र से,
your own, your self, your muscle that softens to flab.          दाहक गैस लैम्प निगाह से,
                                                                                                           अश्लील साहित्य और गन्दी फिल्मों की तर्ज़ पर.
All it takes is to push what you hate,                                   जरुरी है बस तुम्हारे शरीर से, तुम्हारी अस्मिता,
what you fear onto the soft alien flesh.                               तुम्हारे स्व, तुम्हारी कोमल मांसलता से
To bucket out invincible as a tank                                       नफरत करने भर की.
armored with treads without senses                                  यही काफी है कि तुम्हें नफरत है जिस चीज से,
to possess and punish in one act,                                     डरती हो तुम उस शिथिल पराये मांस के साथ जो-जो करने से
to rip up pleasure, to murder those who dare                    उसी के लिये मजबूर किया जाना.
live in the leafy flesh open to love.                                     संवेदनशून्य पहियों से सुसज्जित
                                                                                           किसी अपराजेय टैंक की तरह रौंदना,
                                                                                             अधिकार जमाना और सजा देना साथ
                                                                                                         चीरना-फाड़ना मज़ा लेना
                                                                                                         जो विरोध करे उसे क़त्ल करना
                                                                                                         भोगना मांसल देह काम-क्रीडा के लिये अनावृत.

 .............Marge Piercy                                                              ..........डॉ नीरज कृष्ण

Sunday, 1 April 2018

बिहार का ‘कोहिनूर’~ जो तराशा न जा सका !!


   बाबु वशिष्ठ नारायण सिंह उर्फ वैज्ञानिक जी

डा. वशिष्ट नारायण सिंह का जन्म 2 अप्रैल 1942 को बिहार राज्य के भोजपुर जिले के ग्राम बसन्तपुर में एक साधारण सिपाही के घर में हुआ था ग्राम बसन्तपुर आरा से करीब 22 कि.मी उत्तर-पश्चिम में अवस्थित है इन्होने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा अपने गाँव में प्राप्त की उसके बाद इनका दाखिला नेतरहाट में हुआ, जहाँ से ये उच्चतर माध्यमिक बोर्ड, बिहार में प्रथम स्थान प्राप्त करते हुए पास किये। साइंस कॉलेज, पटना में B.Sc.(Hons) प्रथम वर्ष में ही इनकी प्रतिभा को देखते हुए पटना विश्वविद्यालय ने इन्हें तीनों वर्षों की परीक्षा एक साथ प्रथम वर्ष में ही देने की छूट दे दी थी, और उन्होंने अकेडमी के सारे पुराने मापदंडों को ध्वस्त कर दिया था। तब तक वशिष्ट नारायण अपने सहपाठियों और गुरुओं के बीच गणित के कठिन प्रश्न को कई तरीकों से हल करने के लिये मशहूर हो चुके थे
          उसके कुछ ही महीने बाद विश्वविद्यालय  के Patna College of Engineering में गणित सम्मलेन का आयोजन किया गया था उस सम्मलेन में विश्व प्रसिद्द गणितज्ञ डा. जॉन एल केली अमेरिका के कलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले से पधारे थे आयोजकों ने वशिष्ट नारायण का परिचय डा. केली से कराया। उन्होंने वशिष्ट नारायण को कई कठिन प्रश्न हल करने को दिया। वशिष्ट नारायण की प्रतिभा से डा. केली बहुत प्रभावित हुए और तत्काल बर्कले आकर आगे की पढ़ाई का निमंत्रण दे दिया। वशिष्ट नारायण ने अर्थाभाव के कारण बर्कले जाने में अपनी असमर्थता जतायी। डा.केली ने उनका सारा खर्च वहन करने का भरोसा दिलाया।
          पटना विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनके स्नातक डिग्री लेने के बाद उनका पासपोर्ट/वीसा बनवाकर उन्हें डा.केली के पास कलिफ़ोर्निया भेजवा दिया। डा.केली ने भी अपना वादा निभाया और अपने मार्गदर्शन में रिसर्च कराया। वशिष्ट नारायण ने भी पूरे लगन और मेह्नत के साथ रिसर्च कर Ph. D  की डिग्री प्राप्त कर उस ज़माने का एक कीर्तिमान स्थापित किया। कम उम्र में एक अति कठिन Topics "Reproducing Kernels and Operators with a Cyclic Vectot" पर 1969 में Ph. D प्राप्त कर लेने के कारण वे अमेरिका में भी मशहूर हो गये।

          डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह को प्रतिष्ठित NASA में एसोसिएट साइंटिस्ट प्रोफेसर के पद पर बहाल हुए, जो किसी के लिए भी एक  सपना होता है। परंतु कुछ ही महीनों में उन्हें राष्ट्र-प्रेम सताने लगा और वे 1972 में भारत लौट आये। जबकि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका उन्हें अपनी नागरिकता प्रदान करना चाह रही थी जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। घर लौटने पर पूरे इलाके में उनका शानदार स्वागत हुआ। उनके माता-पिता की प्रतिष्ठा आसमान पर पँहुच गयीभारत लौटने पर इनकी नौकरी पहले भारतीय प्रद्योगिकी संस्थान(IIT) कानपुर,बंबई और बाद में भारतीय सांख्यिकी संस्थान,कलकत्ता में लगी      
          एक तो वशिष्ट नारायण बहुत ही साधारण पृष्ठभूमि के थे और इसके विपरीत उनका विवाह वंदना रानी सिंह से 1973 में एक संभ्रांत परिवार में हो गया। वे खान-पान और रहन-सहन तथा विचार से भी साधारण थे और संयुक्त परिवार के समर्थक थे। इसके विपरीत उनकी पत्नी आधुनिक और एकल परिवार विचार-धारा में विश्वास रखती थी। यही वह समय था जब वशिष्ठ नारायण असामान्य व्यवहार करने लगे थे। वशिष्ठ नारायण सिंह की भाभी प्रभावती जी बतलाती हैं कि छोटी-छोटी बातों पर बहुत गुस्सा हो जाना, पूरा घर सर पर उठा लेना, कमरा बंद करके दिन-दिन भर पढते रहना, रात भर जागना उनके व्यवहार में शामिल था  जल्दी ही कुल मिलाकर यह शादी बेमेल साबित हो गयी और तलाक़ का नौबत आ गयातलाक़ की प्रक्रिया में वशिष्ट इतने प्रताड़ित और अपमानित हुए कि वे पागल हो गये अपने समूह से कट जाना भी उनके पागलपन का एक महत्वपूर्ण कारण बना 1974 में उन्हें पहली बार सिजिफ्रेनिया नामक बिमारी ने उनके मस्तिष्क पर प्रहार किया जिसके परिणामस्वरूप 1977 आते-आते उनकी नौकरी छूट गयी और उन्हें राँची के मानसिक आरोग्यशाला, कांके में भर्ती होना पड़ा
          बेहतर इलाज के क्रम में अपने छोटे भाई अयोध्या सिंह के साथ 1986 में  पुणे जाने के क्रम में वह बीच रास्ते में एक बड़े स्टेशन पर उतर कर लापता हो गये काफी प्रयास के बाद भी नहीं मिले। सन 1992 में बसन्तपुर का नजदीकी बाज़ार गंगा पार डुमरी, जिला छपरा पड़ता है, वहां उनके नजदीक गावँ के दो युवकों ने किसी होटल में जूठे प्लेट धोते हुए देख कर पहचानते हुए कहा ‘अरे इ त बसीठ काका बाड़न’; जिसकी पुष्टि लगभग दूसरे लड़के ने भी की। किसी तरह उनपर निगरानी रखते हुए लड़कों ने स्थानीय थाना को सूचना दिया। यह सूचना तेजी से फैलते हुए जिलाधीश के मार्फ़त मुख्य मन्त्री श्री लालू प्र. यादव तक पहुँच गयी। लालू यादव ने वशिष्ट बाबू को तत्काल पटना बुला लिया।
          मुख्य मन्त्री आवास पर उनका अच्छा स्वागत हुआ और स्नान कराकर उन्हें नया कपड़ा पहनाया गया। मुख्य मन्त्री वशिष्ट बाबू से बोले - "आउर का दीं?" तब वशिष्ट बाबू ने जवाब दिया- "तोहरा पासे का हवे कि हमरा के देबअ, चार आना पइसा दअ"। सभी लोग आवक। उसके बाद वशिष्ट बाबू को उनके पैतृक आवास ग्राम बसन्तपुर पँहुचा दिया गया। उनके छोटे भाई अयोध्या सिंह बताते हैं कि जब भी वे वशिष्ठ बाबु से 1986 से 1992 के गुमनामी काल के बारे में पूछते हैं तो उनका एक ही उत्तर होता है "छोड़अ ई सब ना पूछे के"। अब उनसे इस बारे में कोई सवाल नहीं करता है।
          गणित के क्षेत्र में वशिष्ठ नारायण सिंह को कोई भगवान समझता था तो कोई जादूगर। इन्होंने इस क्षेत्र में कई ऐसे सिद्धांत का आविष्कार किया है जो आज भी प्रचलित है। एक वक्त वह भी था जब इन्होंने आइंस्टिन के सिद्धांत E= MC2 को चैलेंज कर दिया था। इनके इस चैलेंज से सभी गणितज्ञ हैरत में पड़ गए थे। तो अपने आप मे गणित के महारथी कहलाने वाले वशिष्ठ नारायण सिंह ने मैथ में रेयरेस्ट जीनियस कहा जाने वाला गौस की थ्योरी को भी चैलेंज कर दिया था। इन सभी को चैलेंज करते हुए उन्होंने अपने हिसाब से सिद्ध कर सभी के सामने दिखाया। जिसका आज भी देश विदेश के बच्चे अध्ययन करते हैं। इनके बारे में ऐसा कहा जाता है कि अपोलो मिशन के दौरान वो नासा में मौजूद थे तभी गिनती करने वाले कंप्यूटर में अचानक खराबी आ गई। खराबी की वजह से सभी कंप्यूटर कर्मी मैकेनिक का इंतजार करते हुए काम बंद कर दिया था। तो उन्होंने अंगुलियों पर ही सारे आकड़े गिन ली। वहीं जब कंप्यूटर सही हुआ तो इनके द्वारा जोड़ो हुए आंकड़े बिल्कुल सही साबित हुए थे।
          एक कृशकाय वृद्ध, जो आज भी हाथ में पेन लिए घर के चारों ओर भटकता रहता है कभी आपस में ही बातें करते हुए खुश होता है तो कभी अपने आप पर ही नाराज होते हुए गालियां देता है। तो घर की चारदीवारी से लेकर अखबार कॉपी यहां तक कि जमीन पर भी कुछ लिखता रहता है। यह सब बातें देखकर उनके परिजनों की आंखें छलक जाती हैं। कभी वैज्ञानिक जी के नाम से मशहूर व्यक्ति आज न जाने किन कर्मों की सजा काट रहा है।दुखद पहलु यह है कि वशिष्ठ नारायण के साथ ही गणित के न जाने कितने रहस्य विलोपित हो गए

चलते चलते~
1. वशिष्ठ नारायण सिंह सबसे कम उम्र में स्नातकोत्तर(P.G) करने वाले प्रथम भारतीय थे 
2. चाय पिने के पश्चात जब वशिष्ठ नारायण सिंह ने अपने भाई से बोले, तनी खैनी खिलाव; मैंने उनसे कहा कि खैनी  ठीक चीज नइखे, सर। उन्होंने तपाक से कहा - नो, खैनी इस नॉट इन्जुरियस टू हेल्थ, इट इज बुद्धिवर्धक चूर्ण, इसके बाद वो ठठाकर हंसने लगे 
3. वशिष्ठ नारायण सिंह जी का स्वदेश प्रेम के बारे में क्या धारणा थी यह उनके द्वारा लिखित अपने मित्र के पत्र से पता चलता है









Friday, 30 March 2018

आपणो राजस्थान !!

राजस्थान का भारतीय इतिहास के क्षेत्र में अहम् योगदान रहा है। जिस प्रकार की भूमिका गंगा-यमुना दोआब की प्राचीन भारत के इतिहास निर्माण में रही थी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका राजस्थान की मध्यकाल के इतिहास निर्माण में रही। अगर हम यू कहें कि मध्यकालीन इतिहास राजस्थान के इतिहास के बिना अधूरा है तो भी अतिश्योक्ति नहीं होगी। राजस्थान का इतिहास रोमांच से भरा पड़ा है यहीं कारण था कि रोमांटिक युग के इतिहासकार इसकी ओर आकर्षित हुए और उन्होंने अपने कलम की स्याही को दिल खोलकर इतिहास के पृष्ठों पर खर्च किया एवं इस छोटे से राज्य के इतिहास को जग प्रसिद्वि दिला दी।

          इस रंगीलो राजस्थान में सच में न जाने कब क्या दिख जाये, जहाँ प्रकृति ने अपने विविध रंगो से इसका श्रृंगार किया है वहीं नदी, नाले, मैदान, पहाड़ एवं मरूभूमि इसकी सुन्दरता में चार चाँद लगा हुए है। इसके मैदानों एवं पहाड़ों पर खड़े दूर्ग, स्मारक एवं इमारते जहाँ शौर्य, कला एवं प्रेम का अनूठा मिश्रण प्रस्तुत करते है वहीं ये उस गौरवशाली एवं सुनहरें अतीत के साक्षी भी हैं जब राजस्थान की तूती दिल्ली में बोलती थी, उस अतीत के साक्षी है जिसमें शूरवीरों के शौर्यपूर्ण कृत्य को इतिहास के पृष्ठों पर रक्त से लिखा गया।
          राजस्थान की धरा वीर प्रसूता रही है जिसके पग-पग पर एक रणभूमि है जहाँ पर रणबाँकुरों के रणकौशल की गाथाएँ इसका कण-कण गाता है। इतिहास के कानन में विचरण करने वाले मनीषियों को राजस्थान की धरा पर जंमे शूरवीर, पराक्रमी योद्धओं के साहसिक कर्मों ने सदैव आकृष्ठ किया है। इन्हीं मनीषियों में एक कर्नल टॉड भी है जिन्होंने स्वंय कहॉ है कि ’’राजस्थान में कोई भी छोटा-सा राज्य भी ऐसा नहीं है, जिसमें थर्मोपल्ली जैसी रणभूमि न हो और शायद ही कोई ऐसा नगर मिले, जहॉ लियोनिडस जैसा वीर पुरूष उत्पन्न न हुआ हो।’’ यह धोरों की धरती वीरता व पराक्रम के साथ ही उपने राष्ट्र प्रेम, संस्कृति, स्वामीभक्ती एवं गौरक्षा के लिए प्राणों को उत्सर्ग करने हेतु तत्पर रहने वाले शूरवीरों की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है। इस धरती के केवल पुरूष ही नहीं बल्कि बच्चे व औरते तथा उससे भी बढ़कर पशु भी अपने वीरोचित एवं लोमहर्षक कर्मों से दाँतो तले अंगुलियॉ दबाने को मजबूर कर देते है। बच्चों में बालक चंदन तथा कालीबाई, महिलाओं में हाड़ी की रानी सॅलह कॅवर एवं रानियों के जलती ज्वालाओं में जौहर करने के उदाहरण अतुल्नीय है। पशुओं में सर्वविदित एवं परिचित स्वामीभक्त राणा प्रताप का घोड़ा चेतक है, जिस वीरता का प्रदर्शन चेतक ने समर भूमि में किया था उसका बेहद सुन्दर वर्णन श्यामनारायण पाण्डे ने अपनी कविता में किया है-
रण बीच चौकड़ी भर-भर कर
चेतक बन गया निराला थ
राणा प्रताप के घोड़े से
पड़ गया हवा का पाला था।।

यहाँ की संस्कृति ही अद्वितीय और अनुपम है। यह वह धरती है जहॉ माँ अपने बच्चे को पालने में ही यह सिखाती है भले ही अपने प्राणों की बाजी लगा देना पर अपनी धरती को शत्रु के हाथ में मत जाने देना
इला न देणी आपणी, हालरियाँ हुलराय
पुत सिखावे पालणै, मरण बढ़ाइ माएँ।।

वीरता, त्याग एवं राष्ट्रप्रेम के गुण तो इसकी मिट्टी एवं हवा में जिस वजह से इस माटी के वीरपुरूष रण में अपने लहू से मिट्टी को लाल करना तो स्वीकार है किंतु समर भूमि में शत्रु को पीठ दिखाना कदापि स्वीकार नहीं है। वे विजय एवं वीरगति में से एक विकल्प ही चुनते है अतः सच ही इस क्षेत्र की अद्भुत संस्कृति के बारे में कहा गया है-
पांणी रौ कांई पिवै, रगत पीवणी रज्ज।
संकै मन में आ समझ, घण नह बरसै गज्ज।।
 (अर्थात् पानी का क्या पीना? यह मिट्टी तो रक्त पीने वाली है। यह सोच कर बादल यहाँ गरजते और बरसते नहीं है।)
          निश्चय ही इस प्रदेश की भूमि वीर भोग्या रही है किंतु यहाँ जिगीषु एवं धीरोदात्त नयाकों के अतिरिक्त धीरललित, धर्मनिष्ठ, दैवज्ञ, दूरदर्शी, कलाप्रिय, विद्वान एवं जितेंद्रिय राजा तथा नायक भी हुए है। दैवज्ञ नरेश सवाई जयसिंह, वाणी-विलास-वैभव के प्रतीक कुंभा, विद्वान एवं विद्वानों के आश्रयदाता विग्रहराज एवं जितेंद्रिय नागरीदास आदि ऐसे भूपति हुए है जिनमें कला, कलम एवं कटार का दुर्लभ सामंजस्य दिखाई देता है। वास्तव में यहाँ का इतिहास अद्वितीय, अद्भुत एवं अतुल्नीय है। यहाँ राज्यों का उत्थान-पतन भी है तो दरबारी गुटबंदी, गठबंधन, समर्थन एवं दुरभिसंधी भी है। यहाँ ढोला-मारू का प्रेमाख्यान है तो मूमल-महेन्द्र की विरह व्यथा भी है, यहाँ राजपाट त्याग कर जन-जन में भक्ति की अलख जगाने वाले संत पीपा भी है तो कृष्ण भक्ति के रस से समस्त उत्तर भारत को प्लावित करने वाली मीरा भी है। यहाँ पृथ्वी के गुरूत्वार्षण सिद्धांत का प्रतिपादन करने वाले संसार के पहले विद्वान ब्रह्मगुप्त भी है तथा महाविद्वान महाकवि माघ भी है।
         सच में यह भूमि निराली है। इस प्रदेश के गौरवशाली अतीत की खुशबू से इतिहास के पृष्ठ आज भी महक रहे है। महाकवि रामधारी सिंह दिनकर ने भी इतिहास के गौरव को क्या खूब अपनी कविता की पंक्तियों में व्यक्त किया है-
उस अतीत की गौरव गाथा
छिपी उन्हीं उपकूलों में
कीर्ति-सुरभि वह गमक रही
अब भी तेरे वन-फूलों में।