Monday, January 15, 2018

विकसित होते भारत के अंतर्विरोध:- ढुलमुल बुनियादी शिक्षा नीति !!...(क्रम संख्या 02)

गरीबी की रेखा एक ऐसी रेखा है जो गरीब के ऊपर से और अमीर के नीचे से निकलती है।' यह परिभाषा किसी भी मायने में सैद्धांतिक न हो परन्तु व्यावहारिक और जमीनी परिभाषा इससे अलग नहीं हो सकती है। वास्तव में गरीबी की रेखा के जरिये राज्य ऐसे लोगों के चयन की औपचारिकता पूरी करता है जो इससे ज्यादा अभाव में जी रहे हैं कि उन्हें रोज खाना नहीं मिलता है, रोजगार का मुद्दा तो सट्टे जैसा है, नाम मात्र को छप्पर मौजूद है या नहीं है, कपड़ों के नाम पर कुछ चीथड़े वे लपेटे रहते हैं। ये वे लोग हैं जिन्हें विकास की प्रक्रिया में घोषित रूप से सबसे बड़ी बाधा माना जाने लगा है। हालांकि विकास का यह एक अहम् मापदण्ड भी है कि लोगों को गरीबी के दायरे से बाहर निकाला जाये इस दुविधा की स्थिति में लगातार संसाधन झोंके जाते हैं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब अपने संविधान की परिकल्पना की गयी थी तब इन्ही सब मुद्दों को ध्यान में रखकर कतिपय संविधान निर्माताओं ने लोक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना की थी जिसका परिणाम है कि आज हमारे वित्तीय ढांचे से सबसे ज्यादा राशी का भुगतान कल्याणकारी योजनाओं के लिए निकाल दिया जाता है उसके वावजूद 70 वर्षों में देश में इनकी स्थिति में कोई सुधर नहीं हो पा रहा है।

शायद ही कोई दिन ऐसा हो जब देश के किसी न किसी इलाके से गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, बेरोजगारी, कर्ज जैसी तमाम आर्थिक तथा अन्यान्य सामाजिक दुश्वारियों से परेशान लोगों के आत्महत्या करने की खबरें न आती हों। कल रात पुण्य प्रसून(आज तक) के विश्लेषण के अनुसार सरकारी आंकड़ों (NBRC) के अनुसार प्रत्येक घंटे में 17 विद्यार्थी रोज आत्महत्या कर ले रहे हैं। 2014 से 2017 के बीच 26,478  छात्रों ने बेरोजगारी अथवा अच्छी नौकरी नहीं मिलने के कारण आत्महत्या कर लिए हैं।

आजादी के बाद शिक्षा का जो ढांचा चुना और नीतिगत रास्ता चुना उस समय भी निचले स्तर पर कोई बड़ी बहस नहीं हुई। शिक्षा के विकास का नेहरु मॉडल पूरी तरह देश में असफल रहा, देश के हर कोने में और प्रत्येक समुदाय के पास शिक्षा पहुँचाने में यह मॉडल असफल रहा।“सबको शिक्षा” का नारा महज नारा ही बना रहा। सभी बच्चे स्कूल में हों यह सपना ही रह गया। बच्चों के स्कूल न जाने का अर्थ है उन्हें मानवाधिकार से वंचित रखना।
स्कूली शिक्षा व्यवस्था के स्वरुप पर गंभीरता से विचार करें तो पाएंगे कि भारत सरकार की प्राथमिकताओं में स्कूली शिक्षा कभी नहीं रही। आज भी नहीं है। आज भी स्कूली शिक्षा का मात्र 10% नेटवर्क निजी क्षेत्र के दायरे में आता है 90% क्षेत्र सरकारी स्कूलों के दायरे में आता है।

सवाल यह है हम लोकतंत्र के लिए “नागरिक” चाहते हैं या “उपभोक्ता” ? यदि “उपभोक्ता” के जरिए लोकतंत्र का निर्माण करना चाहते हैं तो लोकतंत्र की प्रकृति अलग होगी है। यदि नागरिक के जरिए लोकतंत्र बनाना चाहते हैं तो लोकतंत्र की प्रकृति अलग होगी। “उपभोक्ता” और “नागरिक” में गहरा अन्तर्विरोध है। “उपभोक्ता” के “अन्य” के प्रति कोई सामाजिक सरोकार नहीं होते, वह सिर्फ अपने बारे में सोचता है, निहित स्वार्थों को सामाजिकता कहता है। इसके विपरीत “नागरिक” के निजी नहीं सामाजिक स्वार्थ होते हैं, सामाजिक लक्ष्य होते हैं, उसे अपने से ज्यादा “अन्य” की चिन्ता होती है। लोकतंत्र के विकास के लिए हमें “उपभोक्ता” नहीं “नागरिक” चाहिए। लोकतंत्र कभी भी उपभोक्ता के जरिए समृद्ध नहीं होता, नागरिक और नागरिक-चेतना के जरिए समृद्ध होता है।

वर्तमान सरकार की  पहली आवश्यकता यह होनी चाहिए कि समाज और सरकार राम मंदिर के चिंतन को छोड़कर बेरोजगार युवाओं के भविष्य के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सार्थक चिंतन करे है। क्योंकि युवओं के भविष्य के साथ इस देश का भविष्य भी जुड़ा है जब सबसे ज्यादा आत्महत्याएं खेती, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोज़गार के कारणों से हो रही हों, तब हमें चेत जाना चाहिए है। हमें मान लेना चाहिए कि कहीं कुछ गंभीर गड़बड़ी  है, क्योंकि ये चार क्षेत्र उम्मीद और संरक्षण की नींव पर खड़े होते है।

सफल युवाओं की असफल यात्रा !!

आज के डिजिटल दौड़ में जब हमें इस बात की ख़ुशी होनी चाहिए थी कि वासत्व में समस्त ब्रम्हांड हमारी उन्गलिओं के पोर और मस्तिष्क की सोच की गुलाम हो गयी है,शायद इतनी तो अलादीन के चिराग में भी शक्ति नहीं थी और हम उतने ही लाचार और कमजोर होते चले जा रहे हैं। व्यवस्था से जूझने के बजाय मौत को गले लगा ले रहे हैं।
आज का युवा वर्ग रोजगार के मामले में उतना पिछड़ा हुआ नहीं है जितना की 25-30 वर्षों पूर्व हमलोगों के समय में था। संसाधनों की कमी, माता-पिता का अपने बच्चों के भविष्य से ज्यादा घर और समाज के प्रति आशक्ति(ज्यादातर जो ग्रामीण परिवेश से शहरी वातावरण में ढले थे), हम छात्रों में रोजगार के विविध आयामों की अनभिज्ञता......जैसे कई विषय हैं जिन मामलों में आज के बच्चो का अनुपात ज्यादा अच्छा है। असफलता का प्रतिशत काफी कम हो गया है विशेषकर वे बच्चे जो निजी एवं प्रतिष्ठित संस्थानों में अध्ययन कर रहे हैं।
हालाँकि आज के दौर में भी सरकारी नौकरी का मिल जाना किसी भगवान् की प्राप्ति कम नहीं मानी जा रही है। अभी सरकारी नौकरी की तैयारी करनेवाले प्रतियोगियों में बैंकिंग और सिविल सेवा की तैयारी करनेवाले युवाओं की तादाद अन्य से बहुत ज्यादा है। सरकारी नौकरी या दुसरे शब्दों में कहूँ कि अच्छी नौकरी के लिये जी-तोड़ मेहनत करने और उसके बाद सफल ना हो पाने के बाद अगर कोई अपनी आत्महत्या कर ले अथवा अवसाद में चला जाये, तो सामान्य सी बात लगती है। लेकिन सफल होने के बाद अगर कोई आत्महत्या करता है तो यह विशेष चिंतन का विषय है।
पिछले कुछ दिनों के अंतराल में मैंने कई ऐसे सफल(तथाकथित) लोगों के आत्महत्या की खबर को पढ़ा जो सरकार के महत्वपूर्ण ओहदे पर थे। कुछ माह पहले ही बक्सर(बिहार) का जिलाधिकारी ने बक्सर से चलकर गाजियाबाद में रेल से कट कर आत्महत्या कर लिया, उसके कुछ दिनों के बाद ही बक्सर के ही उप जिलाधिकारी ने अपने आवास पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर लिया और अब कल समाचारपत्र में पढ़ा कि 1988 बैच(सिविल सर्विसेज) के एक अधिकारी जीतेन्द्र झा ने दिल्ली स्थित पालम रेलवे स्टेशन पर मृत(आत्महत्या) पाए गए। अन्य ऐसे कई उदहारण मेरी नजरो के सामने से गुजर रहे हैं जो सामाजिक दृष्टि से नौकरी के लिहाज से काफी सफल रहे हैं जिन्होंने या तो पारिवारिक अथवा विभागीय दायित्व के बोझ के चलते अपने जीवन को ही समाप्त कर लिया। छात्रो एवं असफल युवाओं की तो बात भी नहीं मैं कर रहा हूँ अभी। विडम्बना तो देखिये जो बड़े-बड़े पदाधिकारी अपने विभाग अथवा जिले की विकास की संभावनाओं तो तलाश लेते हैं, जनता की समस्याओं का निवारण कर देते है वही अधिकारी अपने घर का कुशल संचालन करने में असफल होते जा रहे हैं, तारतम्य नहीं बिठा पा रहे हैं।
कभी कहीं पढ़ा था यदि व्यक्ति सम्यक नहीं है तो निश्चित ही उसकी शिक्षा सम्यक नहीं है। हमारे वर्तमान प्रारंभिक शिक्षा व्यवस्था के सिलेबस में ‘फैमिली मैनेजमेंट’ नाम की चीज नही है। हमारी समूची सामाजिक ताना बाना मात्र  S A D पर टिकी हुई है अर्थात  संस्कृति(S), अध्यात्म(A) एवं धार्मिक(D),यानी SAD में परिवार प्रबंधन की बातें बताई गई है। भगवद्गीता में खुश रहने के दो मार्ग बताये गये है-आर्थिक विकास का मार्ग और आध्यात्मिक विकास का मार्ग। पहला भोगवादी है और दूसरा योगवादी। सोशल मीडिया, फ्री वीडियो कॉलिंग सुविधा, सिनेमा ने हमारी लाईफ़ से उस रोमांच या उतावलेपन को ही खत्म कर दिया है जो आज से कुछ दशकों पूर्व हुआ करती थी। कुछ भी जानना होता है आज पलक झपकते ही google पर खोज लेते हैं या youtube पर देख लेते हैं। लेकिन कभी पंद्रह मिनट के लिए आँखे बंद करके हम मैडिटेशन करना नही चाहते न ही पुस्तकों का ही सानिध्य अब पसंद आता है हमें। आज न तो मैडिटेशन के माध्यम से अपने आप को जानने की जिज्ञासा ही नही होती है न पुस्तकों के माध्यम से अपनी संस्कृति को। इस भौतिक एवं आभासी दुनिया से परे भी एक दुनियां है इसके लिए हम कभी वक़्त देना पसंद नही करते। SAD को बुढ़ापे की प्रैक्टिस कहते हैं। ऊपर वर्णित आत्महत्या में बुढापा तो आया ही नही हैं। SAD के सिद्धांत को अगर जवानी में ही अपनाया जाय तो शायद आत्महत्या की नौबत नही आयेगी।
दुसरे की लिखी समस्याएं उसकी अपनी समस्या है,समस्या है कि समाधान हम उसकी समस्याओं में अपनी समाधान को ढूंढते हैं और परिणाम में हम या तो अप्रत्याशित मौत(आत्महत्या) को अपना लेते हैं या अवसाद में चले जाते हैं। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि साधन में सुख है ही नहीं। सुख तो मन में है। हम तो यू ही आपा-धापी में लगे रहते। दूसरों को कोसते रहते, अपनी बुराई को कभी झाँकते ही नही।
पुनः समय आ गया है कि इस आभासी दुनिया से बाहर निकल कर हमें आज कुछ वक्त अपने लिए या अपनों के लिए दिया जाय तो कभी भी अकेलापन नहीं महसूस होगा। किसी भी व्यक्ति, वस्तु या स्थान अथवा तकनीक से अत्यधिक लगाव ही हमें अवसाद की तरफ ले जाता है। किसी भी रंगमंच से कोई कलाकार स्वतः ही उसे छोड़ कर निकल जाये तो यह उसकी अक्षमता को एवं कायरता को ही प्रमाणित करती है। जब रंगमंच पर हम प्रदर्शन के लिए आये ही हैं तो सकारात्मक भूमिका को निभाएं न की नकारात्मक भूमिका या भगोड़े की भूमिका को। जब हमें दुनिया के रंगमंच पर अपने-अपने निर्धारित अभिनय को निभाना ही है तो क्यूँ न अपना श्रेष्ठ प्रदर्शन करें नायक की न मिली हो तो सह-नायक या खलनायक की ही सही। पर निर्धारित पूरी भूमिका को निभाएं कर्मठ बन कर, कायर हो कर नहीं।
अपनी पंक्तियों को मुक्तदा हसन “निदा फाजली” की पंक्तियों से समाप्त कर रहा हूँ-
दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाये तो मिट्टी है, खो जाये तो सोना है
गम हो कि ख़ुशी हो दोनों कुछ देर के साथी हैं
फिर रस्ता ही रस्ता है, हँसना है न रोना है।

दलित बनाम अगड़े की चाक पर चक्कर लगाती भारतीय सामाजिक व्यवस्था !!

ये बहुत शर्म की बात है कि, अब 21वीं शताब्दी मानव समाज ने वैज्ञानिक तौर पर इतनी तरक्की की है कि लोग मंगल ग्रह पर भी जमीन खरीदने की योजना बना रहे हैं, भारतीय समाज तब भी जाति प्रथा जैसी प्राचीन व्यवस्था में विश्वास रखता है और जिसका परिणाम भीमा-कोरेगांव(पुणे) प्रकरण के रूप में समाज के समक्ष प्रस्तुत हुई।
वैधानिक तौर पर अब कोई भी वर्ग भारत में ‘शोषित’, ‘दलित,’ या ‘उपेक्षित’ नहीं है। पहले भी नहीं था। संविधान में सभी नागरिकों को ‘बराबरी’ का दर्जा दिया गया था किन्तु सभी को अपनी प्रगति के लिये परिश्रम तो स्वयं करना ही होगा किन्तु जाति के आधार पर अब आरक्षित वर्ग दूसरे वर्गों की अपेक्षा ‘विशिष्ट वर्ग’ बनते चले जा रहै हैं। अधिक से अधिक वर्ग अपने आप को शोषित तथा उपेक्षित साबित करने में जुट रहे हैं और आरक्षित बन कर विशिष्ट व्यवहार की मांग करने लग पडे हैं।
विकसित सभ्यताओं में ज्ञान, शिक्षा, सामाजिक योग्दान, समर्थ तथा क्षमता के आधार पर सामाजिक वर्गीकरण का होना प्रगतिशीलता की निशानी है। सामाजिक वर्गीकरण प्रत्येक व्यक्ति को प्रगति करने के लिये उत्साहित करता है ताकि वह मेहनत कर के अपने स्तर से और ऊपर उठने का प्रयत्न करें। य़दि मेहनती के बराबर ही अयोग्य, आलसी तथा नकारे व्यक्ति को भी योग्य के जैसा ही सम्मान दे दिया जायगा तो मेहनत कोई भी नहीं करेगा। प्रतिस्पर्धा के वातावरण में सक्षम ही आगे निकल सकता है।
हिन्दू धर्म दया, साहिश्रुता और त्याग का प्रतीक है। लेकिन मैंने दुनिया का ऐसा कोई अन्य धर्म नहीं देखा जिसमे जाति के नाम पर इतने आपसी भेदभाव है। शायद ही कोई ऐसा धर्म हो जिसमे लोग एक दूसरे के लिए इतनी घृणा और तिरस्कार का भाव रखते है।
हिन्दू संस्कृति ने हमेशा आत्म-सम्मान से जीना सिखाया, शायद इसीलिए मुग़लों और अंग्रेजों के क्रूरतापूर्ण 1000 साल के शासन के बाद भी देश मे आज हिन्दू संस्कृति जीवित है। गुरु गोविंद सिंह, छत्रपती शिवाजी, झाँसी की रानी जैसे वीरों ने इस हिन्दू संस्कृति को जीवित रखने के लिए अपना बलिदान दिया और समाज के लिए प्रेरणा श्रोत बने।
मेरा मानना है कि किसी भी समाज मे संतुलन का आधार ज्ञान, धन और बल होता है। अगर ये तीनों किसी एक के हाथ मे केन्द्रित हो जाए तो समाज मे असंतुलन पैदा हो जाता है। इसी ज्ञान को आधार मानकर महान ऋषियों ने समाज को चार वर्णो (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) मे बांटा था।
भारत में जाति व्यवस्था अस्तित्व में कब आयी इसकी कोई भी तिथि निश्चित नहीं है। किन्तु मनुस्मृति के अनुसार, भारत में जाति प्रथा के अन्तर्गत, प्रारम्भ में, लोगों के लिये उनके व्यवसाय के आधार पर आवश्यक कोड वर्णित किये जाते थे। इस प्रकार, ये उनके व्यवसाय पर आधारित होती है। लेकिन, आमतौर पर, लोगों के व्यवसाय विरासत बन गये और जाति व्यवस्था भी व्यवसाय से जन्म में और फिर विरासत के रुप में बदल गयी। अब एक व्यक्ति की जाति उसके जन्म के आधार पर और स्थिर सामाजिक स्थिति हो जाती है।
लेकिन समय के साथ हिन्दू धर्म मे घोर परिवर्तन आए। अब लोग कर्म से नहीं जन्म से जाने जाते है। ब्राह्मण कुल मे पैदा हुआ एक चोर भी खुद को ग्यानी मानने लगा। क्या ऐसे समाज पर किसी को गर्व हो सकता है जो अपने ही धर्म भाइयों को धर्म के नाम पर जिल्लत भरी जिंदगी देता हो?
संवैधानिक प्रावधान
सबसे पहले संविधान की प्रस्तावना में भारत के लिये धारणा है कि भारत ऐसा राष्ट्र है जहां सामाजिक-आर्थिक न्याय हो; जहां अवसरों और स्तर में समानता हो और जहां वैयक्तिक गरिमा सुनिश्चित हो।
संविधान समानता की गारंटी देता है (अनुच्छेद 14); साथ ही राज्यों में भी इस बात को सुनिश्चित करता है कि किसी के भी साथ जाति के आधार पर भेदभाव न हो (अनुच्छेद 15 (1))।
छूआछूत का उन्मूलन कर दिया गया है और इसका किसी भी रुप में व्यवहार में प्रयोग में लाना निषिद्ध है (अनुच्छेद 17)। संविधान ये निर्देश देता है कि कोई भी नागरिक, केवल जाति या धर्म के आधार पर किसी भी अयोग्यता या निषेद्धता का विषय न बनाया जाये (अनुच्छेद 15(2))।
ये राज्यों को शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण देने के लिये भी शक्तियाँ देता है (अनुच्छेद 15(4) और (5)); और ए.सी. के पक्ष में नियुक्तियों में (अनुच्छेद 16(4), 16(4A), 16(4B) और अनुच्छेद 335)। अनुच्छेद 330 में अनुसूचित जाति के लिये भी लोक सभा, अनुच्छेद 332 के अन्तर्गत राज्य विधान सभाओं और अनुच्छेद 243D और 340T के अन्तर्गत स्थानीय स्वनिकायों में सीटें आरक्षण के द्वारा प्रदान की जाती हैं। इसके अलावा, सामाजिक अन्याय और शोषण के सभी रुपों से भी संविधान सुरक्षा की गारंटी देता है (अनुच्छेद 46)।
जाति भेदभाव को प्रतिबंधित करने के लिये अनुच्छेद
संविधान के निर्देशों को पूरा करने के लिये और तथाकथित निम्न जाति के खिलाफ शोषण और भेदभाव की व्यवस्था को रोकने के लिये और भी बहुत से अनुच्छेद संसद ने पारित किये थे। उनमें से कुछ विधान निम्नलिखित हैं:
अस्पृश्यता (दंड़ात्मक) अनुच्छेद, 1955, को नागरिक अधिकारों की सुरक्षा अधिनियम, में 1976 में बदल दिया था।
अनुसूचित जाति और जनजाति के खिलाफ क्रूरता को रोकने और निर्देशित करने के लिये अनुच्छेद 1989 बनाया गया।
हाल में ही, सरकार ने लोक सभा में मैन्युअल सफाई कर्मचारी और उनका पुनर्वास के रुप में रोजगार प्रावधान के नाम से लोक सभा में 2013 में पारित किया था जिसका लक्ष्य मैन्युअल सफाई कर्मचारियों को रोजगार का प्रावधान कराना था। ये बिल कर्मचारियों के पुनर्वास और उन्हें वैकल्पिक रोजगार प्रदान करने के लिये था।
ये दूसरा सामाजिक कल्याण वैधानिकीकरण है जिसका उद्देश्य मैन्युअल कर्मचारियों या वाल्मिकी जाति या भंगियों को सामाजिक तंत्र में बहुत सी सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक भेदभाव से सुरक्षा प्रदान करना था।
बचपन मे पढ़ा था भारत देश अनेकताओं मे एकता का देश है लेकिन हिन्दू धर्म मे ये बात ठीक नहीं बैठती क्योकि इसमे एकता नहीं है। हर कोई या तो पंडित है या ठाकुर, या तो बनिया है या दलित। जात-पात से ऊपर उठकर जो सोच सके, मेरी नज़र मे सिर्फ वही हिन्दू कहलाने का अधिकारी है, बाकी सभी ढोंगी।

भारतेंदु हरिश्चंद्र : हिंदी साहित्य का महान ‘अनुसंधानकर्ता’ !!

भारतेंदु हरिश्चंद्र : जन्म 9सितम्बर 1850 - मृत्यु 6 जनवरी 1885
भारतेंदु हरिश्चंद्र हिंदी साहित्य के इतिहास की निरंतर प्रवहमान सिन्धु यात्रा में किसी सिद्धस्त सागारिक की तरह उस घाट पर खड़े मिलते हैं जहाँ से हिंदी भाषा अपभ्रंश के संकरत्व और ब्रजभाषा के मिलाप के बोहित का मोह त्याग कर साहित्यिक खड़ी बोली की सुन्दर नौका में सवार हो रही थी। 6 सितम्बर,1850 ई. को भारतेंदु ने वाराणसी के एक वैश्य परिवार में जन्म लिया और प्रखर बुद्धि मालिक ने मात्र 6 वर्ष की आयु में एक दोहा सुनाकर ‘होनहार बिरवान के होत चिकने पात’ की उक्ति को चरितार्थ कर दिया। भारतेंदु का परिवार केवल धन-सम्पदा से ही नहीं, अपितु ज्ञान-सम्पदा से भी संपन्न था। भारतेंदु और कशी नरेश, दोनों का परिवार उस समय के जाने माने लेखकों और संगीतकारों की आश्रयस्थली था जहाँ हर समय ज्ञान-विज्ञान, काव्य पाठ और गीत-संगीत निनादित रहता था। भारतेंदु अपनी रचनाओं के वैविध्य के कारण जल्दी ही लोकप्रिय हो गए। भारतेंदु के काव्य में ब्रज और कड़ी बोली दोनों ही भाषा रूप मिलते हैं।

भारतेंदु हरिश्चंद्र का हिंदी साहित्य को सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने सर्वप्रथम हिंदी भाषा एवं साहित्य को एक नई दिशा प्रदान किया। भारतेंदु के प्रादुर्भाव के पहले हमारे यहाँ हिंदी  भाषा के दो प्रमुख शैली का प्रभाव था एक राजा लक्ष्मण सिंह की संस्कृ​तनिष्ठ हिंदी और दूसरा राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ की फारसीनिष्ठ शैली का। दोनों ही शैलियां अपनी अति को छू रही थीं। एक हिंदी भाषा में संस्कृत के शब्दों को चुन-चुनकर डाल रही थी तो दूसरा फारसी के शब्दों को। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इन दोनों प्रवृत्तियों का एक में जोड़ने का प्रयाश किया।
सन 1873 में हरिश्चंद्र ने अपनी पत्रिका “हरिश्चंद्र मैगजीन” में पहली बार पुरानी परंपरागत एवं उस समय प्रचलित संस्कृत एवं फारसी शब्दों से प्रभावित हिंदी लेखन शैली से अलग मिश्रित हिंदी का प्रयोग प्रारंभ किया जिसमे खडी बोली के साथ उर्दू के प्रचलित शब्दों का प्रयोग करना शुरू किया जिसमे तत्सम और उससे निकले उनसे पहले तद्भव शब्दों का खूब प्रयोग हुआ साथ ही कठिन और अबूझ शब्दों का प्रयोग कम से कम करना शुरू किया। भाषा के इसी रूप को ‘हिंदुस्तानी शैली’ कहा गया, जिसे बाद में प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों ने और ज्यादा परिष्कृत किया। हालांकि कविता में वे खड़ी बोली के बजाय ब्रज का ही इस्तेमाल करते थे। अल्पायु में ही उन्होंने 21 काव्य ग्रंथ, 48 प्रबंध काव्य और कई मुक्तको की रचना की।
भारतेंदु हरिश्चंद्र के भीतर पेशेवर लेखकीय भाव कूट-कूट कर भरा हुआ था। पेशेवर का अर्थ धन कमाना नहीं बल्कि लेखन के प्रति निष्ठा,पूर्व तैयारी, लेखकों को संगठित करना़, ज्ञान की अपडेटिंग रखना, सत्य का आग्रह और ईमानदारी। भारतेन्दु के लेखन पर काशी की संस्कृति की गहरी छाप थी।
भारतेन्दु हरिश्चंद्र का जन्म एक ऐसे परिवार में जन्म हुआ था जिसका अंग्रेजों के साथ गहरा ताल्लुकात था। इनके पिता 'बाबू गोपाल चन्द्र' भी एक कवि थे। इनके घराने में वैभव एवं प्रतिष्ठा थी। जब इनकी अवस्था मात्र 5 वर्ष की थी, इनकी माता चल बसीं और दस वर्ष की आयु में पिता जी भी चल बसे। भारतेन्दु जी विलक्षण प्रतिभा के व्यक्ति थे। इन्होंने अपने परिस्थितियों से गम्भीर प्रेरणा ली। इनके मित्र मण्डली में बड़े-बड़े लेखक, कवि एवं विचारक थे, जिनकी बातों से ये प्रभावित थे। इनके पास विपुल धनराशि थी, जिसे इन्होंने साहित्यकारों की सहायता हेतु मुक्त हस्त से दान किया। इस संबंध को भारतेन्दु आलोचनात्मक नजरिए से देखते हुए कहते थे "इस धन ने मेरे पूर्वजों को खाया है, अब मैं इसे खाऊँगा।" 
हरिश्चंद्र बाल्यकाल से ही परम उदार थे। यही कारण था कि इनकी उदारता लोगों को आकर्षित करती थी। इन्होंने विशाल वैभव एवं धनराशि को विविध संस्थाओं को दिया है। इनकी विद्वता से प्रभावित होकर ही विद्वतजनों ने इन्हें 'भारतेन्दु' की उपाधि प्रदान की। अपनी उच्चकोटी के लेखन कार्य के माध्यम से ये दूर-दूर तक जाने जाते थे। इनकी कृतियों का अध्ययन करने पर आभास होता है कि इनमें कवि, लेखक और नाटककार बनने की जो प्रतिभा थी, वह अदभुत थी। ये बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न साहित्यकार थे।
भारतेन्दु के बारे में सही नजरिए से बातें करने वाले कम हैं और उनके दृष्टिकोण का अनुसरण करने वाले और भी कम हैं। मसलन भारतेन्दु को देशाटन का शौक था, घूम घूमकर देश को जानने का शौक था, हिंदी के लेखक -शिक्षक देशाटन कम से कम करते हैं। देशाटन करके देश को जानना और फिर उसके अनुभवों से साहित्य को समृध्द करना, देश की जनता के वैविध्य को सामने लाना। हिन्दी में यह संयोग दुर्लभ होता जा रहा है। 
यद्यपि भारतेन्दु जी विविध भाषाओं में रचनायें करते थे, किन्तु ब्रजभाषा पर इनका असाधारण अधिकार था। इस भाषा में इन्होंने अदभुत श्रृंगारिकता का परिचय दिया है। इनका साहित्य प्रेममय था, क्योंकि प्रेम को लेकर ही इन्होंने अपने 'सप्त संग्रह' प्रकाशित किए हैं। ‘प्रेम माधुरी’ इनकी सर्वोत्कृष्ट रचना है। कहा जाता है कि ‘अंधेर नगरी’ नाटक की रचना इन्होने एक रात्री में ही कर दिया था। ‘सुलोचना’ इनका प्रमुख आख्यान है तथा 'बादशाह दर्पण' इतिहास की जानकारी प्रदान करने वाला ग्रन्थ है।
जिंदगी लंबी नहीं...बड़ी होनी चाहिए...!’ फिल्म ‘आनंद’ का यह चर्चित संवाद (जीवन-दर्शन) हिंदी साहित्य के  पितामह भारतेंदु हरिश्चंद्र पर भी सटीक बैठता है। उन्होंने सिर्फ 34 साल चार महीने की छोटी सी आयु में हिंदी साहित्य के क्षेत्र में अपना इतना विपुल योगदान दिया कि हैरानी होती है कि कोई इंसान इतनी छोटी सी उम्र में इतना कुछ कैसे कर सकता है। आज का हिंदी साहित्य जहां खड़ा है उसकी नींव का ज्यादातर हिस्सा भारतेंदु हरिश्चंद्र ने खड़ा किया था। वास्तव में भारतेंदु हरिश्चंद्र हिंदी साहित्य का महान ‘अनुसंधानकर्ता’ थे।
भारतेंदु सामाजिक रूप से काफी सक्रीय थे एवं सार्वजनिक कार्यक्रमों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते थे। भारतेन्दु जिंदादिल इंसान थे। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र अंतिम समय में जब बीमार थे तब लोग उनसे हालचाल पूछने आ रहे थे 6 जनवरी 1850 को सुबह बोले, "हमारे जीवन के नाटक का प्रोग्राम नित्य नया नया छप रहा है- पहले दिन ज्वर की, दूसरे दिन दर्द की तीसरे दिन खांसी की सीन हो चुकी है, देखें लास्ट नाइट कब होती है।" अपने जीवन के अंतिम समय में भी इस तरह की जिंदादिली बनाए रखना बहुत बड़ी बात है।