बिहार दिवस (22 मार्च) : क्या खोया क्या पाया !!


आज सडकों पर लिखे हैं सैकड़ो नारे न देख
घर अँधेरा है तू, आकाश के तारे न देख। 
                      .......@दुष्यंत कुमार 
आध्यात्मिक और सांस्कृतिक सम्पन्नता से पूर्ण बिहार का परिचय कुछ शब्दों में प्रस्तुत करना कठिन है। बिहार की मिट्टी इतनी प्रस्फुटित और उर्जावान है कि हर कोई भी इसकी ओर खिंचा चला आता है। बिहार की मिट्टी में विनम्र आतिथ्य के सम्मान के साथ ही साथ उग्र आन्दोलन का भी तेज भरा हुआ है। चाहे वो स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये हो या स्वतंत्रता के बाद अपने सम्मान की रक्षा के लिये, बिहार सदैव विनम्रता के साथ अग्रणी पंक्ति में खड़ा रहा है। 
          बौद्ध धर्म के भिक्षु एवं भिक्षुणी के रहने के स्थान को विहार कहा जाता है। बिहार का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है पर 22 मार्च 1912 ई को इसकी अधिकारिक स्थापना हुई और इस लिहाज से आज बिहार 105 वर्ष पूरा कर लिया है। 
          बिहार ने बुद्ध, महावीर, गुरु गोविंद सिंह, चाणक्य, आर्यभट जैसा खगोलशास्त्री, बोधायान जैसा व्याकरणाचार्य, विद्यापति जैसा लोककवि, अष्टावक्र, याज्ञवल्वय, श्रृंगी ऋषि, ऋषि अगस्तय, राजा जनक, गार्गी की जन्मभूमि, ऋषि अगस्तय की पत्नी लोपामुद्रा जिसने ऋगवेद में 320 श्लोंको की रचना की और जिसे तीन अध्यायों में रचे सहस्त्रनाम से जाना जाता है। याज्ञवलक्य की दूसरी पत्नी मैत्रेयी जिनके द्वारा दस श्लोक ऋगवेद में मिलते हैं तथा याज्ञवलक्य की पहली विदूषि पत्नी कात्यायनि की कर्मभूमि एवं ऋषि विश्वमित्र की तपोभूमि होने का इसे सौभाग्य प्राप्त है। जहां के वायुमंडल में आदिकवि वाल्मीकि का काव्य गूंज रहा हो। आदिजगत गुरु शंकराचार्य को इसी बिहार में मंडन मिश्रा की पत्नी भारती के हाथों पराजित होना पडा।
         भारत को एक राजनीतिक इकाई के रूप में खडा़ करने वाले ‘गुप्त एवं मौर्य’ साम्राज्य बिहार की पहचान है। ये वो धरती है जहाँ पर भारत का लोकतंत्र से पहला परिचय हुआ । जहाँ आजातशत्रु ने अपनी सत्ता के लिए जनमत संग्रह करवाया ।
बिहार वो ज्ञानभूमि है जहां भारत में पहली बार शिक्षा गुरुकुल से निकल कर विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय से रूबरू हुई। जहाँ ज्ञान और अध्ययन की परम्परा बुद्ध से शुरू होकर बिहार के नालंदा, विक्रमशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों द्वारा समृद्ध हुई।
बिहार वो संघर्ष भूमि है जहाँ रामायण की पृष्ठभूमि बक्सर में ताड़का वध के रूप में लिखा गया। 1857 में जगदीशपुर के बाबु वीर कुंवर सिंह तथा बाद में चंपारण सत्याग्रह में चम्पारण आंदोलन के प्रमुख प्रणेता बाबु ब्रजकिशोर प्रसाद ने देशरत्न डा राजेंद्र प्रसाद से मिलकर महात्मा गांधी के नेतृत्व में अन्याय के विरूद्ध आंदोलन की शुरुआत की। आजादी की लडाई में बटुकेश्वर दत्त, खुदीराम बोस प्रफुल्ल चंद चाकी, योगेन्द्र शुक्ल, श्याम देव नारायण, उमाकांत सिंह एवं फुलेना प्रसाद जैसे क्रांतिकारीयों ने स्वराज एवं स्वतंत्रता आंदोलन की मशाल जलाए रखा।
          हमें नहीं भूलना चाहिए कि जब साहित्य को राष्टवादी विचारधारा से जोड़ने की जरूरत हुई तो बिहार के राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर को जब जनमानस को आंचलिकता के आईने में देखने की जरूरत हुई तो फनिश्वरनाथ रेणु को, जब व्यवस्था परिवर्तन के साहित्यक शंखनाद की जरूरत हुई तो बाबा नागार्जुन जैसे व्यक्तियों को बिहार ने प्रस्तुत किया। गीतों के राजकुमार गोपाल सिंह नेपाली, रामवृक्ष बेनीपुरी, कलक्टर सिंह केशरी के साथ ही राजा राधिका रमन प्रसाद सिंह ने साहित्य की माध्यम से देश की अपूर्व सेवा की है। जब कला और कौशल की बात आई तो मधुबनी पेंटिंग्स लेकर यह बिहार राष्ट्र के सामने सीना तानकर खडा हो गया। रंग मंच की दृष्टि से स्व. भिखारी ठाकुर का भी अन्य भाषाओं में कोई सानी नहीं है जिन्हें भोजपुरी का शेक्सपीयर भी कहा जाता है ।
          चर्चिल की प्रसिद्ध पंक्तियो के साथ अपनी बात को समाप्त कर रहा हूँ, उसने कहा था- ‘अतीत में जितनी दूर तक देख सकते हो, देखो। इससे भविष्य की राह निकलेगी।‘ बिहार के स्थापना दिवस के मौके पर इस उक्ति को याद करने का मतलब अतीत से ग्रस्त होने का नहीं, बल्कि उसके गौरव से प्रेरणा लेने, उसे आवश्यक व उपयोगी मान कर प्रासंगिक बनाने और अंततः चरितार्थ करने से है।



दुनिया के कोने-कोने में बसे प्रत्येक बिहारी को बिहार दिवस की शुभकामना। जय बिहार

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